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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1679

श्वसगुञ्जार

( ६९ )

हर्षित होइ सतगुरु गुण गावै । भक्ति कि बात सदा मन भावै ॥
गुरु सनमुख होइ सेवा लावै । सदाकाल तेहि मस्तक लावै ॥
संपुट वदन क्षीणता होई । सतगुरु शब्दहि एक विलोई ॥
सतगुरु देखि न परदा आनै । शब्दकी चाल सदा पहिचानै ॥
सदा अधीन रहै तनमाही । भागे काल देखिके ताही ॥
कर जोरै सनमुख शिर नावै । लाज कानकी दशा मिटावै ॥
ऐसी लक्ष गहै तन पास। पावन पान लोक होइ वासा ॥
ऐसी लक्ष विचारेउ हंसा । दीन्हेउ ताहि शब्दकर अंशा ॥
लाज काज कह देहु बहाई । भेद सुधारत काल पराई ॥
माता बेटी भई नेवारी । लजा तजिके काल बिडारी ॥
लोक लाजकी दशा मिटावै । तौ रिपुकाल निकट नहि आवै ॥
रामचन्द्र त्रिभुवन के राजा । लोक लाजबहि कपिदलसाजा ॥
जानि परी नहि यमकी वानी । ताते काल कीन्ह तन हानी ॥
लाज लिये तन करै उदासा । तेहि मन भरम भूतकरबासा ॥
गुरुसों करै कपट चतुराई । चाल बिहुन कालपुर जाई ॥
भक्त कहावै लजा नहि तोरै । निश्चल काल नर्क महाँ बोरै ॥
भक्त करै कुल दशा मिटावै । परदा ठानि कालपुर जावै ॥
सो सतगुरु जो होय सयाना । चाल चलावै शब्द प्रमाना ॥
आगत परदा मेटि बहावै । पाछे भक्ति पन्थ महाँ आवै ॥
कपट छाड़िकै शीस उतारै । हंस दशा धरी मुक्ति सुधारै ॥
शीस उतारि हाथ पर लेई । पाछे पाँव ताहिपर देई ॥
भक्तिका चित हर्षित होई । ममता मोह लहर तज दोई ॥
कामिनि कनककालकरफन्दा । भयउ काल कपटि मन मन्दा ॥
दुवो शीस अर्पना लाई । मुक्ति पंथ पावै तब भाई ॥
पावै भेद शब्द सहि दानी । काल कल्पना मेटै जानी ॥