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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1678

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बोधसागर

लभे गात मोट तन भारी । विरह विकार कोधअधिकारी॥
छोट शरीर पातरी वामा । आपु तजै अन्त विश्रामा ॥
निहली चितवनि ऐंचा तानी । बहुते पुरुष एक पटरानी ॥
विहसत बोले कुटिल निहारै । आपु जरे औरन कहँ जारै ॥
आगे चलै पाछे तन देखै । गुण औगुण एकौ नहिं लेखै ॥
ऊपर हँसै मनही पछताई । देह थोरहिं बहुत पुआई ॥
एक थन छोट कठोर कुबानी । एक थनझालरि विषकी खानी॥
नाभी पर तीनि होइ रेखा । सुखसम्पति सपनेहुनहींदेखा ॥
इन्द्री मांझ गुञ्ज होइ भारी । जो परसै तेहि करै खुआरी ॥
मोट पतंग चाकरी चाला । तेहि देखत मिय होइ बेहाला ॥
पग पातर पलो छत नारा । परसन बास परै यम धारा ॥
कनअंगरी अघर तिन लागै । आपु नाह तजि परघर बागै ॥
अस लक्षण होइ जाके गाता । प्रान लेइ करै यम घाता ॥
कुम्भ लिलार खम्भ जो होई । जो परशै सो जाय बिगोई ॥
कर पग पलौ गुञ्ज सनेही । परसत होइ भालुकी देही ॥
जोरे पुअर करमह होई । नाहरि नाहक आसै सोई ॥
अहहि होय लक्ष तिरझूला । काल स्वरूप होइ अस्थूला ॥
मुक्तिपन्थ कबहुं नहिं चाहै । सदा विकार विरह रस लाहै ॥
चञ्चल चित् थिर नहिं होई । भजन भंग रस भक्ति बिगोई ॥
वरुणी बसे बिसंभर जोरी । नेत्र बिलोन रंग होइ गोरी ॥
झंखत फिरै प्रकट नहिं होई । अन्तर भक्ति ऊपर होइ छोई ॥
प्रेमवन्ती होइ सुरति निहारै । आप तरे औरन कहँ तारै ॥
करे दंडवत निर्भय नारी । भक्तिवन्त बहु लीला धारी ॥
बिगसित बदन शीलकी आखी । कुल परिवार भक्तिगणसाखी ॥
सतगुरु नाम सुनै सजुपावै । मण्डल चारि शब्द फैलावै ॥