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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1669

श्वसगुञ्जार

( ५९ )

बुद्धि नाम युग पारस सनेही । चित अभिमान रहे नहिं देही ॥
बुद्धि नाम युग बीते जबही । इच्छा राशि गरासे तबही ॥
इच्छा युगकी अकथ कहानी । सुनहु सन्देश कहो सहिदानी ॥
इच्छा आदि पुरुषकी काया । तासु नेह सब लोग बनाया ॥
सो इच्छा है जीवन नेहा । रही समाय जहां लौ देहा ॥
ता युगमाही विषय विकारा । ज्ञान न उपजै भर्म पसारा ॥
ता युग माहि धैर नहिं धीरा । लालच लोभहि व्यापै पीरा ॥
इच्छा युगकी अटपट डोरी । शहर सँधार होय निश चोरी ॥
जब जब इच्छा युग विस्तारी । काया कष्ट होय दुख भारी ॥
ता युगकी बाकी भुगतावै । दृष्टि नाहिं अदृष्टि दिखावै ॥
अन्न अहार करै जब कोई । इच्छा युग तब पूरण होई ॥
तासे युगकी दूसरी धारा । सतगुरु मिलै तो होय उवारा ॥
सतगुरु शरण अमर पद पावै । इच्छा समय दूरी बिसरावै ॥
इच्छा युगकर तार पसारा । लाज महा बल तजै विकारा ॥
सातों दण्ड इच्छा कर भावा । दण्ड पांच सातहि बिसरावा ॥
पांच शून्य इच्छा कर साथी । मद माते जस मङ्गल हाथी ॥
तासु नेह संयम जब पावै । इच्छा मेटि गरव बिसरावै ॥
इच्छा युगकी एतिक बानी । सतगुरु मिलै होय छुटानी ॥
जाहि देह सतसुत्ती बीरा । ताकह काल देह नहिं पीरा ॥
समय-कालत्रासव्यापै नहीं, इच्छा युगके माहिं ।
सतगुरुसो परचय करै, परसै निरगुण नाहिं ॥

चौपाई

चौथे युगको करौ बखाना । धर्म महाबल माह समाना ॥
अभय तरंग ताहि युग नामा । संशय रहित सदा बिसरामा ॥
तेहि युग माहि सरव सुख होई । अहंकार व्यापै नहिं कोई ॥