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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1670

( ६० )

बोधसागर

तेहिधुग माहि सुधाकी खानी । बोले धीर मधुर धुनि बानी ॥
झीनी रङ्ग तरंग विराजै । नाना नाद अर्ध धुनि गाजै ॥
सातों द्वीप होइ उजियारा । दामिनि दमकै शहर मझारा ॥
वन औ वृक्ष सघन सब होई । सदा बसन्त खेले सब कोई ॥
षट ऋतु महा एक सम तूला । एकै बानी एक अस्थूला ॥
साहब सेवक एकै होई । सदा बसन्त खेले सब कोई ॥
साहब सन्त लख सब कोई । साहब सेवक लखै न कोई ॥
( एकै बास बसै सब कोई । )

साहब सेवककी एकै शोभा । चीन्हि न परै अङ्गकी ओभा ॥
साहब सेवक बरन दुहेला । एकै बरण गुरु औ चेला ॥
जैसे फूल बास कह तोरी । पाछे फूल बास गहि जोरी ॥
पाछे फूल शोभासों देही । तिलतजितेल बास गहि लेही ॥
विना भेद जीव होइ अन्धेरा । पाछे परै कालकी घेरा ॥
सीख बिना गुरु छुटे नाहीं । बिरि फिरि परिहै भौचक माहीं ॥
गुरु सुवास है फूल सनेही । सीख स्वरूप आसिका देही ॥
गुरु बिन कौन उतारै पारा । कठिन काल है भौजल धारा ॥

समय-विनसतगुरु नहि बाचै, फिरि बुडे तेहि माहिं ।

भवसागरके त्रासते, गुरु पकरी बांहि ॥

चौपाई

युगत रंगकी कला अपारा । बिना भेदको करै बिचारा ॥
जस तरंग जलमाह विराजै । ऐसे शब्द शीश पर छाजै ॥
मन मकरन्दीके गुण ऐसा । कोटके बासै विषधर जैसा ॥
अग्नि बीच काया कह डाढै । सागर मांझ दून होइ चाढै ॥
पर्वत मारि उडावे छारा । पुढुमी मेटि करै मसि आरा ॥
सूर्य मेटि सब किरन वनावै । पवन बांधि काया दिखरावै ॥