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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1668

( ५८ )

बोधसागर

गहर टंकोर जब धरनी मारा । गहर कहर रस ज्ञान अपारा ॥
गहर यम युग बीता जबही । मोक्ष महाबल उपजे तबही ॥
मोक्ष नाम जग सत्य सुरंगा । निमिषि लक्ष दलसात तुरंग ॥
मोक्ष नाग युग बीति जब जाई । द्वापर युगकी परलै आई ॥
जब परलै द्वापरकी होई । आदिअन्त सबजाय बिगोई ॥
द्वापर अन्त बिगुरचन भारी । दुःख प्रचंड सुखसबै खुवारी ॥
बीता द्वापर कलियुग आवा । कलियुग कालकलाके भावा ॥
कलियुग महाँ युगचार समाना । चारिउ युगको करै बखाना ॥
चारिउ युगकी अर्थ कहानी । बिन परिचै सबयमकी खानी ॥
सतगुरु बिना न होय मिटाऊ । चारिउ घरी कालकी दाऊ ॥
चारि घरी युगचारि बँधाना । कहाँ भेद सुनु संत सुजाना ॥
प्रथमहि युगकर चेतन नाऊ । चेतनि चित करै सब ठाऊँ ॥
चेतनियुगमहाँ चिताको धामा । विस्मय हर्ष दुनौ विश्रामा ॥
चेतनि चिता करै सब ठाऊँ । महा बली है श्वास सुभाऊँ ॥
तीनहिं ताप तपै ब्रह्मण्डा । भरमि भूत व्यापै नौ खण्डा ॥
भर्मित पौन भर्मकी खानी । भर्म हाथ सब दुनी बिकानी ॥
कैतौ पढै गुनै संसारा । बिनसतगुरुनहिं चितसुधारा ॥
सतगुरु मिलै होय सत चूला । तेहि पाछै उत्पतिकर मूला ॥
दोरस युग बुद्धी बलनामा । श्रुची अश्रुची करै जो कामा ॥
ताकी संख्या बहुत विचारा । छःसै सत्तरि दण्ड पसारा ॥
पांच दण्ड वाकी रहि वासा । ताका भेद काल परकासा ॥
बुद्धी कुबुद्धी दोउ कर भाऊ । एकहि युग दोउ रहनि बताऊ ॥
बुद्धि हीन मैं मत पसारा । बिनु आँकुश नहिं होत सुधारा ॥
अंकुश देई मिलै गुरु पूरा । मोह महामद विषहोय दूरा ॥
बुद्धि नाम युगकी सहिदानी । सुमति सनेह सुरति लपटानी ॥