कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1667, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्वसगुआर
( ५७ )
बुद्धी युगकी बुद्धी अपारा । तायुग महाकाल बरियारा ॥
ज्ञान गयँद होइ असवारा । बुद्धि युगमान फोरे महिभारा ॥
बुधिकबधिक बाँधिकरे कमाई । विषे चतुराई कुमति समाई ॥
एही विधि बुधि युगचलि जाई । तेहि पीछे मन बरतैं आई ॥
मन मतंग महामद माता । तेज तपस्या व्यापै गाता ॥
मनयुग ऊंच नीच सतलीला । बरपै झारी विषैको शीला ॥
मन युगकी श्वासा बहुरंगी । ज्यों जलमध्ये उठै तरंगी ॥
मन युगराज बीतिगा जबही । अहंकार युग उपजा तबही ॥
अहंकार युग अनंत समाना । मरै पतंग हार नहीं माना ॥
हारे नहीं आपु अहंकारा । गरजै छुन्छ हारे सुख भारा ॥
अहंकार युग श्वासा ऊनी । गरचि घुमडिबरपै फिरि सूनी ॥
अहंकार ऊद्रेग अपारा । श्वासा हीन तत्व छिनधारा ॥
अहंकार युग बीते जबही । त्रेताकी परलै भइ तबही ॥
त्रेता अन्तकाल जब कीन्हों । आधी निशा टंकोरजोदीन्हों ॥
आधी रात नाद घन बाजा । महानिशान मेघ जनु गाजा ॥
त्रेता आदि अन्त व्यवहारा । उपजा द्रवा परकला अपारा ॥
द्वापर युगकी कला अनन्ता । सुखदुखमध्य आदिदुखअन्ता ॥
प्रथम घरी द्वापरकी आई । अर्थनाम युग महा समाई ॥
अर्थनाम युग द्वापर माहां । अर्थ अहर्निश व्यापै ताहां ॥
अर्थनाम युग घरी समाना । घरिकै बीते युग क्षय माना ॥
एक युग बीते दूसर आवा । धर्मनाम युग तहीं धरावा ॥
धर्मयुग धरनी धरु साँचा । श्वासा छहसै सतरी पाँचा ॥
धर्मधार औ धीर तुरझा । धर्मयुग रोग वियोग सुरझा ॥
धर्मनाम युग बीते जबही । गहर काल युग बरतैं तबही ॥
गहरकाल युग कहर कमाई । रविरथ बीच ध्वजा फहराई ॥