सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1660, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1660

( ५० )

बोधसागर

खूँटा तर होय निकरी धारा । चली सरस्वती फोरि पगारा ॥
मध्य लहरि विषधार सखानी । गंगा यमुना मध्य समानी ॥
त्रिकुटी संगम भयउ मिलावा । मनही पवन लेत विरमावा ॥
भैंवरगुफा माधवकर थाना । बसै त्रिवेणी प्रयाग स्थाना ॥
त्रिवेणी तट वसै प्रयागा । जागत सोवै भाग अभाग ॥
गनि गंधर्व सुनि सबके थाना । सुरनर करै पैठि अस्नाना ॥
तैतिस कोटि देवगण नारी । किन्नर गुणी कंचनी भारी ॥
यक्ष यक्षनी देव कुमारी । नागसुता अप्सरा सुभारी ॥
चटि विमानसबकरिहैजोहारी । काया मध्य इहअदभुत भारी ॥
असुरपिशाचचारिखानिजुलाहल । त्रिवेणी तट करी कुलाहल ॥
यक्ष यक्ष असुर सब देवा । बसे ग्राम करै माधव सेवा ॥
तीन लोक जब जीव निवासा । सो सब करै त्रिवेणी बासा ॥
तेहि त्रिवेणी तट माधो देवा । सब मिलि करै ताहिकी सेवा ॥
तब प्रयाग होइ चटि प्रवाहा । गंगासागर संगम जाहा ॥
देश देश गंगा फिरि आई । घाट घाट बहु क्षेत्र बनाई ॥
जहां तहां जप ध्यान लगावै । योग्य यज्ञ व्रत प्राप्त नहावै ॥
ऋतु बसंत प्रयागहि धावहि । मकर महीना वजार लगावहि ॥
अरध उरध बिच लागी हाटा । भीतर बाहर औघट घाटा ॥
गर्भमाहि सब युगति बनावा । तीनि कचहरि तहां बसावा ॥
जहां नदी संगम परवाना । तहैंवा रचा एक अस्थाना ॥
संगम बीच गुफाके तीरा । सातहि द्वार गुफामहैं बीरा ॥
एकद्वार होय शब्द सुधारे । एक द्वार होय रूप निहारे ॥
एक द्वार होय बास बसावै । एक द्वार होय अग्नि समावै ॥
एक द्वार होय खाद संवारे । एक द्वार होय न्याय निवारे ॥
एक द्वार होय नाद उचारै । सत्य सुकृतकी रहनि विचारे ॥