सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1659, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1659

शवासुगुप्कार

( ४९ )

नख शिख अंग एक अनुहारी । देह स्वभाव वचन दुह मारी ॥
शक्ति देह विरह अधिकारी । शिव आशिष शक्तिको चारी ॥
इहि विधि रचना रची बिलोई । गर्भ सनेह संपूरन सोई ॥
नखशिख रचा गर्भ अस्थाना । सात द्रौप नौखण्ड वखाना ॥
एक द्रौपमें सातों दीपा । सात सुकृत तेहिमाय समीपा ॥
प्रथमै गर्भ द्रौप उपजावा । ता ऊपर रचना बिलमावा ॥
एकद्रौप नौखण्ड बनावा । त्रिकुटी सात तहाँ निरमावा ॥
एक द्रौपमें सातों नाला । सातों कमल अधर दुहमाला ॥
सरवर सात कमल तहाँ साता । रंग पांच पांचौ उतपाता ॥
पांचके मध्यहि पांच रसीला । त्रिकुटीमध्य एकतहाँ कीला ॥
ता कीलामहँ कानी लागी । पौन सनेह आतमा जागी ॥
ता कीलामहँ लागी होरी । खूटा गाडि पवन झकझोरी ॥
ता खूटा महँ डोरि लगाई । मन पवना गहि राखु झुलाई ॥
झुलि मन पवन झुलावे चेरी । इक घर शून्य एक घर फेरी ॥
खूटा होय पवन झकझोरे । इंगला पिंगला सुषुमण जोरे ॥
रवि शशि मनपौना गहि जोरी । खूट न लागि सबनकी डोरी ॥
मेरे दंडपर खूटा गाडा । नदी तीन ता ऊपर बाडा ॥
खूटाकी बाई दिशि है गंगा । विमल शीतल बहे नीर तरंग्गा ॥
चन्द्र सनेही जिव जल परशै । सुरति स्वरूप धनी दिल दरशै ॥
तासु खूटाके दहिने अंगा । यमुना नदी बहै बहुरंग्गा ॥
कीर्ति नीर और पीत तुरंगा । लहर लाल तेज विष संग्गा ॥
तहाँ बसै सुर जीवके साथ । खल एक बयालिस हाथा ॥
कला अनंत रूप रस नाथा । सबै अर्थ नहि दीसै माथा ॥
बाढि नदी जो दोउ करारा । शीतल तेज बहै दोउ धारा ॥
तिसरी नदी है गुप्त प्रवाहा । नाजल थाह न होय अथाहा ॥