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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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शवासुञ्जार

( ५१ )

सात नाल चौदह सुरभाऊ । सातों करहै एक सुभाऊ ॥
सातों सात शून्य मह वासा । सातों बसै गुफाके पास ॥
गुफाके मध्य कंदरा वासा । तहां सातों मिलि करै निवासा ॥
एतिक कुञ्ज द्रौपरी शोभा । आवागमन मोहमद लोभा ॥
कुञ्ज भँवरकी रचना भारी । शून्यसहज धुनिसकल सुधारी ॥
दुवहु नाल कैसे के सोरी । एक सुखवंकनाल मह जोरी ॥
अग्र नील अमरकी डोरी । शोभानाल होय विष रसघोरी ॥
कुञ्ज द्रौप रचि सुधर बनावा । नेह अमर पद क्षीर समावा ॥
सुधर द्रौप परनाभि सँवारा । नाभी मण्डल पौन किंवारा ॥
पौन घोर नाभी रस कीला । मध्य सरोंवर जंबू शीला ॥
जम्बु द्रौप यम करहि स्थाना । ताहि द्रौपमाहि जीव भुलाना ॥
नाभि द्रौप रचि कच्छ बनावा । इंद्री आसनको रंग सुभावा ॥
कच्छ कला निज द्रौप सुधारा । ऋतु वसन्त जावन विस्तारा ॥
कच्छ द्रौप काशी अस्थाना । नरनारी हि करै अस्नाना ॥
वरुणा असी गंगके तीरा । मनि कर्णिका निर्मल नीरा ॥
लिंग जलहरी माहि समाना । नर नारि पूजही धर ध्याना ॥
पूजहि कामिनी मंगल गावहि । रहसि रहसि लिंगही न्हवावहि ॥
अक्षत चंदन बिल्व चढावहि । धूप दीप दे तत्त्व लगावहि ॥
भामिनी भाव फूलरंग धरही । करि असनान बसन भुइधरही ॥
सोइ बसन नर नाटक माँही । काशी तेहि बसनकी छाँही ॥
सोइ बसनकी वास उडानी । योग भोग छलकी सहिदानी ॥
बसन कुसुम दल ध्वजा उडाई । कच्छ द्रौप शिव शिव शरनाई ॥
कच्छ द्रौप रचा रस कोपा । लिंग जलहरी घर घर रोपा ॥
कच्छ द्रौप शिवको अस्थाना । शक्तिमांहि शिव आप समाना ॥
शिवशक्ती रंग रूप रसीला । शिवसमान शक्ती गहि लीला ॥