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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1634

( २४ )

बोधसागर

खाए अखज चले एडाई । जस मडवाको स्थान अघाई ॥
ब्राह्मणहुको झूठी आसा । हरि नहिं भजे न हरिके दासा ॥
कहके बिर ब्रह्मा करोए । उत्तम जन्म पाय जड खोए ॥
जूठी बात वेद निरमाई । चार वर्ण आश्रमहिं दृढ़ाई ॥
ऋषि अगसी सहस्र बखानी । ते ब्रह्माके सुत उतपानी ॥
जेते ऋषि तेते मतधारी । अस्तुति करि हसेब तुम्हारी ॥
ब्रह्मादिक सुनि देव गण भारी । अस्तुति करिहैं विष्णु तुम्हारी ॥
निशिदिन ध्यानपिताकोधरिहो । किंचित ध्यानजोतअनुसरिहो ॥

साखी-विचलि गयउ निजनामको, गहे कुमारग जानि ।
तीनलोकगुण विस्तरेऊ, निरञ्जन आदि भवानि ॥

चौपाई

कहै कबीर सुनौ धर्मदासा । दोऊमिलि यह मत परकाशा ॥
यह सब खेल कामनी कीन्हा । निरञ्जन बास झून्यभी लीन्हा ॥
ज्योति निरंजन ध्यान लखाई । शिव ब्रह्माको भेद सुनाई ॥
सेवहु विष्णु निरञ्जन ध्याना । हे सुत वचन निश्चय मम जाना ॥
ताते ज्ञान अगम फैलाहो । जाते तामस सिद्ध कहा हो ॥
सिद्ध न कामत होइहै भारी । ज्ञान अगम गुण होहि भिखारी ॥
अंश दहन तन तामस भारी । असुरभाव पशु वासु वतारी ॥
मतपा खंड ठगोरी टोना । षट् दर्शन पाखंड खिलोना ॥
यंत्र मन्त्र विखया अधिकारी । अन्तर ध्यान भक्त बुव धारी ॥
तव गुण सहस्र नाम ऊचरिहे । एक अंश चौसठ योगिन होइहे ॥
कर खपरलें मंगल गैहे । यह उपदेश महादेव देहे ॥
( शंकर चिह्न इहै सो पैहैं । ) " " " " ॥
रजशुचि सतगुन दया समानी । असुरहतन भक्तन रजधानी ॥
आगम कहो संघ सुनि लिन्हेउ । जहां जसभावतहांतस कीन्हेउ ॥