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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1633

शवासुखार

( २३ )

खोजि थाकि माता पई आए । काहु साँच काहु झूठ सुनाए ॥
ब्रह्महि भाषा झूठ संदेशा । सकुचि वचननहिं कहेवोमहेशा ॥
भाषा विष्णु सत्यकी रेखा । खोजि थाकि पिता नहिं देखा ॥
माता बिहँसि कही तब बानी । ब्रह्मा झूठ झूठ तौ खानी ॥
शिव लजाय शिर नीचे राखा । साँच झूठ एको नहिं भाषा ॥
ताते करहु योग तप जाई । जटा बढाय विश्रुति रमाई ॥
( तुम सुत करो योग तप जाई । शीश जटा तन भवम चढाई ) ॥
लेहु आमण्डल भेषसो कीन्हौ । शिवको थापि भवनी दीन्हा ॥

साखी—जप तप योग समै हठ, आगे ध्यान पसार ।

माना कह्यो क्रोध करि, चतुरमुख अन्ध अहार ॥

मातहि कीन्ह विष्णु पर दाय। मुखहि चूमके कण्ठ लगाया ॥
सत्य वचन सुत बोलेउ बानी । तीनहु लोक करहु रजधानी ॥
शिव ब्रह्मा करिहैं तोर सेवा । गण गन्धर्व ऋषि मुनि देवा ॥
ब्रह्मा मोसों झूठ लगावा । तेहि कारण विधि झूठ कहावा ॥
ब्रह्मा वेद पढ़े बहु भांति । कुकरम कर दिवस औ राती ॥
( विद्या वेद पढ़े बहु भांती । कुकरम करे दिवस औ राती ) ॥
एहि अवगुण गायत्री गार्ई । ब्रह्मा दोष शाप तिन पाई ॥
मृत्यु लोक गो धरे शरीरा । अघ भुगते चौरासी थीरा ॥
गोय होय नारी कल्यारी । अघनिचोए होए पातक भारी ॥
जहाँ लग पुहुप खान परकाशा । निरधिन ठारे तुम्हारो बासा ॥
झूठी बात वेद में निर्माई । च्यार वर्णमें बड़ी बड़ाई ॥
पहिले चारों वरन पुजावै । दक्षिणा कारण गरा कटावै ॥
गरा कटाए करावे पूजा । गायलै सभे ब्रह्मा नहीं दूजा ॥
लए मूँड पडिवो रमाई । ब्राह्मण भए सो काल कसाई ॥