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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1635

शवासुआर

( २५ )

चारि खानि ब्रह्मे निरमाई । चामहि त्वचा लुब्ध लौ लाई ॥
शिवको वरन भेद नहीं होई । क्रोधरूप धरि भेष विगोई ॥
मात विष्णुपर दाया कीन्हौ । पिता दिखाय निकटहि दीन्हौ ॥
(अनुभव दया विष्णु परकीन्हौ । )

पिताको दर्श विष्णु जब पावा । तब माता कह शीश नवावा ॥
माता पिता एक है गयऊ । विष्णु देखि चित हर्षित भयऊ ॥
माता पिता एक मिलि गयऊ । विष्णु समाय जोति महाँगयऊ ॥
तेहि पाछे जग सिरजे लेऊ । ताको वरण सविस्तर कहेऊ ॥
प्रथमें चारि खानि निरमाई । लक्ष चौरासी योनि बनाई ॥
चारि खानिकी चारिउ बानी । उपजी तीनिलोक सहिदानी ॥
चारि खानि रचि कियो पसारा । चारि वरन पाखण्ड सँवारा ॥
(चौदहभुवन करचो विस्तारा । )

लक्ष चौरासी योनी कीन्हौ । चारि खानि महाँ एकही चीन्हौ ॥
लक्ष चौरासी बचन बखाना । चारि खानि जीव एकै साना ॥
रचना रची सखा बहु रंगा । सुर नर मुनि गणका मतरंगा ॥
कामदेवकी कला अंगंगा । पशु पक्षी सुर नर मुनि संगा ॥
कामकला सबही भरमावै । शिव शक्ती संग काम लगावै ॥
उत्पति प्रलय रची अविनाशी । कामिनि काम कालकी फाँशी ॥
कनक कामिनी फन्द बनावा । तेहि फन्दे सबही अरुझावा ॥
कनक कामिनी फंदा कीन्हा । चार खानिमें एकै चीन्हा ॥
नर बानर कीट पतंग सँवारी । सबके सँग करै रखवारी ॥
(नर नारि जत खान सँवारी । सब घट काम करै रखवारी ॥
पशु पक्षी जत कीट पतंगा । रक्षक भक्षक सबके सङ्गा ॥
शवासा सार होय गुआरी । पांचों तत्त्व सँग विस्तारी ॥
पांचों तत्त्व तुरै बल जोरा । तापर चढ़े साहु औ चौरा ॥