कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २२ )
बोधसागर
कामिनि दर्श सदा लौ लावै । राज पाट सब कीर्ति बनावै ॥
“ ” ” ( । तीनों सुतको राज सिखावै ) ॥
राज नीति सुत चित्तिहि धरहीं । मनसा ध्यान पिताको करहीं ॥
खोजत खोजत बहु युग गयऊ । पिता पुत्रसों भेट न भयऊ ॥
ध्यान धरत बहुते युग गयऊ । ) ” ” ” ”
कामिनि पुरुष एकसंग रहऊ । सुतकी बात पुरुष सों कहऊ ॥
वहाँकी बात न सुतसों भाखे । करै दुलार सदासँग राखे ॥
इहि विधिबहुतदिवसचलिगयऊ । सुत न खोज पिताकर कियऊ ॥
धरत ध्यान बहुते युग गयऊ । पिताको खोज करत तब भयऊ ॥
मातासों पूछे सुत बाता । पिता हमार कहाँ गये माता ॥
माता कहै सुतन्हसों बानी । पिता तुम्हार हमहुँ नहि जानी ॥
रचना सकल हमहीं होई । हमसो दूसरा और न कोई ॥
रचना सब मोहीते होई । दूसर जान परो नहि कोई ॥
हमही पिता हमही हैं माता । हमही तीनि लोककी दाता ॥
हमहीं छाँडि कोइ दूसर नाही । तुम जो पूछहुँ सो कहँ काहीं ॥
तीन लोक महाँ दूसर नाही । माता कपट करै मन माहीं ॥
तब सुत सोच कीन्ह मनमाहीं । पिताका भेद बतावत नाही ॥
आपु आपु कह सुत सब हूठे । माता वचन कहै सब झूठे ॥
तब माता कहै बचन रिसाई । पिताको दर्श करहु तुम जाई ॥
माता कहै फूल लै धावहु । पिताके शीस परसिके आवहु ॥
पुढुप सामाधि वासले धाओ । पिताके शीस परसिके आओ ॥
चले पुत्र पिताकी आसा । पिता रहे पुत्रनके पास ॥
खोजत बहुत दिवस चलिगयऊ । पिताको दर्श कतहुँ नहि भयऊ ॥
तीनों सुत सो दर्शन भयऊ । ” ” ” ” ॥
पिता निकट सुत दूरि सिधाये । खोजत कतहुँ अन्त नहि पाये ॥