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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1601

कमालबोध

( १३ )

तुम ता औगुन बहुते कीन्हा । दोऊनजर तुमगुरुनहिं चीन्हा ॥
अब तो हमसो कछु न होई । गुरुका शब्द हुआ होय सोई ॥
इसमें दोष गुरुका नाई । तुम्हरी दुर्मति भूत गति पाई ॥
दोहा-तुम जानो हम भूलिया, दिलमें रहे डुलास ।
कलयुग जीव बहु भूलसी, सो रहे तुमरे पास ॥

चौपाई

बहुतक शिष्य होयंगे भाई । सो सतगुरुसो कौल बँधाई ॥
तन मन धन चरणों धरिहैं । ऐसी लंबारी मुख सो करिहैं ॥
ऐसी कहि वह शब्द सो लईहै । शब्द लेह पुनि एक न दइहै ॥
साचा कौल हजुरी कीना । कौल चूक सो तुमको दीना ॥
ऐसा कलिका कठिन तमाशा । बहुत रहेंगे तुमरे पास ॥
जो कोइ होइ हैं कौल मलीना । ताको जनम भूतको दीना ॥

दोहा-सब दोजरव फिरि आईहैं, तब तुम करो सम्हार ।

इल्म फकीरी साधिके, उतरो भवजल पार ॥

चौपाई

अहमद शाह चले शिरनायी । धनिसतगुरु मैं तुव बलि जाई॥
हमरे तनकी तपन बुझायी । दरियाखां चले पछतायी ॥
सत्य भूपकी राह चलायी । जैसा किया तैसा फल पायी ॥
शिष्य होयके दुर्मति करहीं । सो तो जनम भूतको धरहीं ॥

कमाल वचन

तबहीं कमाल कहे शिर नाई । हे समरथ करु कौन उपाई ॥
कैसे चलिहहिं पंथ हमारा । कैसे होइहहिं जीव उबारा ॥
कैसे आवागमन मिटाऊ । सो साहब मोहि भाषि सुनाऊ ॥
कैसे उतरूँ भवजल पारा । सतगुरु मेरा करहु उबारा ॥