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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1602

( १४ )

बोधसागर

सत गुरु वचन

सुनहु कमाल कहूँ चित्त लाई । तुमरे पंथमें सुक्ती नाई ॥
प्रथम शिष्य दरियाको कीना । ताको जन्म भूतको दीना ॥
पहले इल्म फकीरी दीना । फिरके जन्म भूतको कीना ॥
उनही जन्म भूतको पायी । शब्द पाय पुनि गये गवाई ॥
पंथ न चले ऐसे सुनि लेहू । प्रथम बोध विचली पुनि गेहू ॥

दोहा-पंथ न चले कमालजी, कोटिक करो उपाय ।

घोखे जीव बिगोय हो, धर्मराय धरिखाय ॥

कमाल वचन

हाथ जोरिके शीश नवायी । समरथ मोहि कहो समझायी ॥
पंथ न चले कौन विधि करिये । कहोतो अलोप पांव हम धरिये ॥
मैं हूँ जेठा शिष्य गुसाई । पंथ ना चलइ भौजल भाई ॥
विना पंथ मोहि कौन पिछाने । कमाल कबीर सबै जग जाने ॥

सतगुरु वचन

सतगुरु कहै कमाल सुने बानी । पंथ चलनकी सुधि पहिचानी ॥
कमाल नाम ले पंथ चलाऊ । कही ज्ञान घर घर समझाऊ ॥
इल्म फकीरी राखो हम पास । और सखी पद करो परकाशा ॥
यही शब्द करो गुरु आई । बिंद साधना रहे सब ताई ॥
रहनि गहनि तुम देह बुझाई । सो जिव धर्म सुन्नमें जाई ॥
चारों युगमें अटल मम दासा । तुम साखी पद करो प्रकाशा ॥
यह राह मेटि भाषो अधिकारा । निश्चय परिहो नर्क मंझारा ॥

साखी-परमारथ तुम साजहू, करहू शब्द विचार ।

भौसागरमें भय नहीं, सोडह नाम अधार ॥

कमाल-वचन चौपाई

समरथ गुरु ऐसी सुनि लेहू । इल्म फकीरी किसकूँ देहूँ ॥