कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1600, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १२ )
बोधसागर
हम तो फूलका पखुरी डारा । कौन चूक है गुरु हमारा ॥
पहिले इलम फकीरी दीना । फिरके जनम भूतको कीना ॥
कौन चूक अपराध गुसाई । सो समरथ मोहि देहु बताई ॥
थोड़ा चूक बहुत दुख दीना । हो समरथ मैं होऊं अधीना ॥
भूत जनम बड़ होय मलीना । महा दुख तुम सदा जो दीना ॥
ऐसी चूक है कहा हमारी । भूत खानिका दुख बड़ भारी ॥
सतगुरु वचन
सुनो दरिया यक बात हमारी । पहली बोधहिमें भयी खुवारी ॥
बिना कसनी इलम तोहि दीन्हा । बिनाकसनीतुमगुरुनहिँ चीन्हा ॥
निरखि परखिकेजिनसिर दीना । सो कबहुँ ना होय मलीना ॥
पहले जगमें जीव चितायी । समझि सीख पुनि दीजे ताही ॥
इलम दिया जब रहा न कोई । पीर सुरीदके वेष होय जोई ॥
कलियुग जीव कालके सारा । सीखे चतुराई करै अपारा ॥
इलम लेनकुं झगरा ठाने । कसनी सुनी कोध मन आने ॥
कसनी परीक्षा
पहिले कसनी कसहिँ अपारा । तन मन धन यह तीन विचारा ॥
यह तीनों है त्रैगुण सारी । यह तीनों मिलि भक्ति उजारी ॥
यह तीनों मिलि गुरुकेबस होई । करहु सुरीद इलम देहु सोई ॥
दोहा—यह तीनों अरपे नहीं, कोटिक कहे बनाय ।
कहै कबीर सत मानहु, तेहि जिव गोता खाय ॥
चौपाई
यह तीनों तुम दीना नहीं । इलम फकीरी सहज तुम पाई ॥
तुमको कसनी नहीं लगारा । तुम दोजखकानर गुरुको मारा ॥
अपना कौल तुम गये हिरायी । ताते जनम भूतको पायी ॥