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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1566

( १९० )

बोधसागर

कबीर हरीकी भक्ति बिन, धिक जीवन संसार ।
धुवाँकेर धौलाहरा जात न लागे बार ॥
कबीर-जबलग नाता जातिका तबलग भक्ति न होय ।
भक्ति करे कोइ शूरमा, जाति वरण कुल खोय ॥
कबीर-भक्ति निशानी मुक्तिकी, चढे संत सब धाय ।
जिनजिन मनआलस किया, तिनही तिन जहडाय ॥
कबीर-जबलग आशा देहकी, तबलग भक्ति न होय ।
आशा त्यागे हरि भजे, भक्त कहावै सोय ॥
सब इंद्रिनके भोगमें, राग द्वेष तजि देहु ।
काम कोध रजगुणहिंते, नेह न कीजे एहु ॥
ठौर पुनीत निहारिके, कर आसन विस्तार ।
अभयशांति ब्रह्मचर्यगहि, इमि समाधिको धार ॥
दृष्टि न इत उत तानिये, हगमहँ ध्यान लगाय ।
चित्त चंचलको रोकिके, रसरसते बैठाय ॥
दीपशिखा बिन पवनके, इमि योगी मन थीर ।
योग जो करे वैराग युत, सो मेटे भवभीर ॥
ज्ञानी रोगी आर्थिही, जिज्ञासू ये चार ।
सो सबही हरि ध्यावते, ज्ञानी उतरे पार ॥
गोत्र ऊंच अरु नीच जो, पावत है जग जीव ।
आलस नहिं अरु व्याकुली, ताने तमगुण कीव ॥
ताते ज्ञानको गोप है, हिरदयमें अँधियार ।
रजतमको सतपेल जब, होइ ज्ञान इंद्रिदार ॥
मृदु शुचि हो गुरु सेइये, ब्रह्मचर्य चित लाय ।
अनहिंसा तप दान युत, निग्रह मौन गहाय ॥
कर्मके फलको त्याग है, देह कर्म नहिं त्याग ।