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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1567

धर्मबोध

( १११ )

मनकामनाऽहंकार युत, सो राजस दुख भाग ॥
शुभअशुभ नहि जान जो, किये सहित अभिमान ।
हिंसायुत है कर्म जो, तामस ताहि बखान ॥
थोरे दिनके कर्मको, बहुत अबार लगाय ।
आलस्ये कारज किये, तामें तम सरसाय ॥
क्षमासमान न तप कोई, सुख नहि तोष समान ।
तृष्णासम नहि व्याध कोई, धर्म न दया समान ॥
व्रतके पाँचो अंग हैं, त्याग न चाहे न मोहैं ।
निःसंशय निस्प्रীहतां, यह पाँचो विधि जोह ॥
योगके पाँचो अंग हैं, क्षमा अष्कामं * बताय ।
समर्द्धि आनन्दमय, फिरि अनन्य कहलाय ॥
भक्तिके पाँचो अंग है, नामरटन धुन धार ।
सत्य शान्ति अरु प्रेमदृढ़, सुरति न चरनन टार ॥
भक्तिमें तीन प्रकारके प्रेम कहावे संत ।
रूप देह अत्यन्त जो, तीनों नाम बंदंत ॥
ज्ञानके लक्षण अब कहौं, दश प्रकारको ज्ञान ।
नित अक्रोध वैराग्युत, इन्द्रीदमन बखान ॥
दयापाल परमार्थी, क्षमावंत निर्धार ।
शोकहीन निलौंभ कहि, निर्भयं चित्तं उदार ॥
शंभ दमै विरागं विवेकं है, ज्ञानके साधन चार ।
सात्त्विक राजसि तामसी, निर्गुण श्रद्धा सार ॥
अंग योगके पाँच यह, संयमै मौनं यकर्न्त ।
विषयत्याग आतमै निरख; होय दुःखको अन्त ॥


• निष्काम ।