कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1565, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंधर्मबोध
( १८९ )
जाप एक पल नहीं छुटै, टुटै न पावै तार ॥
जब जप करते थकि गये, हरि यश गावे सन्त ।
कै निज धर्म पुराण पढ, ऐसो धर्म सिद्धंत ॥
मोहको जब लग त्याग नहीं, तबलग नहीं वैराग ।
जो मनमें वैराग नहीं, तौ समाधि नहीं लाग ॥
दुखको तजि भागे नहीं, सुख नहीं चाहत सोय ।
नेह क्रोध भय त्यागिये, बुद्धिकी थिरता होय ॥
आप जो खैचकै आपमें, कर्म बटोरे आप ।
विषयते इंद्दी खैंचिये, कटे देहको पाप ॥
इन्द्री भोग न पाव जब, मृतक सो रहि जात ।
तब इंद्रियन परे जो, सो आतम दर्शांत ॥
बुद्धिवन्त जे पुरुषवर, बलकरि इंद्दी साध ।
विषयन ध्यावन काम उग, कोह मोहकर बाध ॥
मोहते सुधि बुद्धि नाश है, सुधि बुधि बिन मृतहोय ।
जबै इंद्रियनको वश कियो, तबै शांति कह सोय ॥
शांतिते मन थिरता गहे, मन थिरताते योग ।
योग ध्यानसुध्यानते, ज्ञान गहैं सब लोग ॥
ज्ञानते आतम लाभ है, लाभ न ताहि समान ।
इन्द्री दम नित जाग्रन, तबही बुद्धि थिरान ॥
मनमें जो विषयन भजे, कर्म तजे का होय ।
सर्व मनोरथ त्यागिये, बुद्धि शांति तब होय ॥
फाका फुक्र फिक नहीं, इंद्रहि जाने रंक ।
सात गांठ कोपीनके, तऊ न साधुको शंक ॥
हरिकी भक्ति कबीर करु, तजि विषया रस चोज ।
बारबार नहीं पाइये, मनुज जन्मकी मौज ॥