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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1536

( १६० )

बोधसागर

अथ गरीबदासजीकी कथा--चौपाई

गरीबदासकी कथा बखानो । जाटके कुलमें सो प्रकटानो ॥
दिखी निकट नग्र छोटियानी । सतगुरु कृपा भयो सो ज्ञानी ॥
सत्यकबीरको सुशाय उचारा । जक्तमाहिं निज पंथ पसारा ॥
सतगुरुकी अस्तुति भल गावै । अधिक प्रीति मनमाहिं बढ़ावै ॥
एकसौ वर्ष ताहि चलि गयऊ । प्रकट गरीबदास तब भयऊ ॥

इति

अथ कबीर आचार वर्णन--चौपाई

सत्यनामकी सेवा धारा । सुमिरण ध्यान नाम निरधारा ॥
सतगुरु वर्णन प्रीति सुहाये । मूरतिको नहिं शीस नवाये ॥
तीरथ व्रत मूरति भ्रमजाला । सत्यभक्ति गहिये सत चाला ॥
निरगुण सरगुणको तजि दीजै । सत्यपुरुषकी भक्ति गहीजै ॥
संत गुरुकी सेवा धारे । तन मन धन अर्पण करि डारे ॥
कोटिन तीर्थ गुरुके चरना । संचय सोच पोच सब हरना ॥
दुखी दीन देखत दुख लागा । परमारथ पथ तन धन त्यागा ॥
गृही साधु दोउ एक समाना । परमदयाल दोहूको बाना ॥
मद्य मांस भेष जगमें जोई । महा मलीन जानिये सोई ॥
परम दया सब जिवपर पालौ । अधोहृष्टि मारगमें चालौ ॥
हिंसा कर्म जेते जगमाहीं । ताके कबहुँ निकट न जाहीं ॥
सब जीवनकी कर रखवाली । जीवघात कहुँ बात न चाली ॥
वर्षा ऋतु जब जिव अधिकारा । तब नहिं कबहुँ पंथ पग धारा ॥
अमल नाम जगमें हैं जेते । सकल अभक्ष जानिये तेते ॥

सत्यकबीर बचन

साखी-विष्णुधर्म जैनी दया, मुसलमान यकतार ।
ये तीनों जब जानि लै, तब जिव उतरे पार ॥