कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्वसमवेदबोध
( १५९ )
तुम बड़ भक्त भवसागर आवा । और जीवको कौन चलावा ॥
निरंकार सब सृष्टि भुलावा । तुम करि भक्तिलौटिक्योंआवा॥
नानक वचन
धन्य पुरुष तुम यह पद भाखी । यह पद अमर गुप्त कह राखी ॥
जबलों यम तुमको नहीं पावा । अगम अपार भर्म फैलावा ॥
कहो गोसाईं हमते ज्ञाना । परमपुरुष हम तुमको जाना ॥
धनि जिंदा प्रभु पुरुष पुराना । विरले जन तुमको पहिचाना ॥
जिन्दा वचन
भये दयाल पुरुष गुरु ज्ञानी । गहो पान परवाना बानी ॥
भली भई तुम हमको पावा । सकलो पंथ कालको धावा ॥
तुम इतने अब भये निनारा । फेरि जन्म ना होय तुम्हारा ॥
भली सुरति तुम हमको चीन्हा । अमरमंत्र हम तुमको दीन्हा ॥
स्वसमवेद हम कहि निज बानी । परमपुरुष गति तुम्हें बखानी॥
नानक वचन
धन्य पुरुष ज्ञानी करतारा । जीवकाज प्रकटे संसारा ॥
धनि करता तुम बंदी छोरा । ज्ञान तुम्हार महा बल जोरा ॥
दिया दान गुरु किया उबारा । नानक अमरलोक पग धारा ॥
इति
चौपाई
यहि विधि नानक गुरुपद गहेऊ । शिष शाखा तेहि जगमें रहेऊ ॥
गुरुपद तजि बहु पंथ चलाये । अन्य देवकी सेव गहाये ॥
परमपुरुष पद नहीं पहिचाना । भांति अनेक बनायो बाना ॥
अजहुँ गुरुकी तीन निशानी । गहै कछुक गुरुकी निजबानी ॥
द्वितिये सत्यनामकी साका । तृतिये देखा श्वेत पताका ॥
क्षत्री कुल नानक तन धारी । ताको सुयश गाव संसारी ॥
इति