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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1537

स्वसमवेदबोध

( १६१ )

चौपाई

तीनों जहाँ होय संध्या । सो कबीर आचारको ठड़ा ॥
शौच अचार शुद्ध सब करनी । उज्ज्वल किया बइल्लव बरनी ॥
अंतर बाहर परम पुनीता । हिसा रहित कर्म चितचीता ॥
जस जैनी जिव दाया पाला । ताही सम कबीर मुनि चाला ॥
मुसलमानके जिमि अछाहा । ताहीते निज नेह निवाहा ॥
तिमि कबीर मुनिके सतनामा । रह लौलीन सदा सो तामा ॥
स्वसमवेद विधि करि शुभकर्मा । सार शब्द गहि पावै मर्मा ॥
सतगुन गहे बइल्लव ताते । भाषे परम पुरुषकी बातें ॥
शुद्ध भेष सब शुक्लाचारा । शुक्लवर्ण शुक्ले व्यौहारा ॥
शली टोपी तुलसी माला । कंठी कंठमें तिलक विशाला ॥
सूत्र रु शिखा बइल्लव बाना । योग युक्ति गुरुधर्म प्रमाना ॥
करकमंडल चोला पहिरे । चर्चा ज्ञानमाहिं बड़ गहिरे ॥
तत्त्वमाहिं निःतत्त्व बताई । झीना ज्ञान कथै ऋषिराई ॥
असन वसन विधिवत सो धरई । धर्मवस्तु कछु संग्रह करही ॥

इति

अथ तिलकस्वरूपवर्णन—चौपाई

ऊर्द्धपुण्ड्र अरु दंडाकारा । शुभ्रतिलक तेहि सोह लिलारा ॥
नासा अग्र भागते काढा । मस्तक अंत प्रयंत लो ठाढा ॥
नाकबांस दोउ भुकुटी बीते । मस्तक अंत प्रयंतलों खींचे ॥
दंडाकार सो तिलक बताई । तासु महामन कहो न जाई ॥
यमदंडनको दंडक दंडा । कर्म भर्म सो कर शतखंडा ॥
परम बइल्लव तिलक जो धारी । तिलक देखियम बिलखि सिधारी
ताको अर्थ कहो किमि जाई । सुर नर मुनि कोइ पार न पाई ॥

बो० सा० ९/