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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1499

स्वसमवेदबोध

( १२३ )

पुनि सत सुकृत लोक सीधारा । पहुँच हंस पुरुष दरबारा ॥
पुरुष दरश सब हंसन पाईं । कोटि सोम रवि रोम लजाईं ॥
पुरुष स्वरूप भये सब हंसा । बीती सब यमकी भ्रम शंसा ॥
कछु दिन कीने लोक निवासा । बहुरि आय देख्यो निजदासा ॥
निशि दिन रहौं गुप्त जगमाहीं । मोकहँ कोइ जिव चीन्हत नाहीं ॥
जिहि जीवन परबोध्यौ आईं । दीन्हौं तिनको लोक पठाईं ॥
सत्यलोक हंसनको बासा । सदा वसंत पुरुषके पास ॥

इति

सतयुगका वृत्तान्त

अथ त्रेतायुगमें सतसुकृतजीको पृथ्वीमें आगमनकथा और

मुनींद्रनाम धारण और जबत जीवतारण

सत्कबीर वचन-चौपाई

सतयुग गत है त्रेता आवा । नाम मुनींद्र जीव मुक्तावा ॥
जब आयो जीवन उपदेशा । धर्मराय उर हुआ अँदेशा ॥
इन भवसागर मोर उजारा । जिव ले जाय पुरुष दरबारा ॥
कितनो छल बल करो उपाईं । ज्ञानी डर मोर नाहिं डेराईं ॥
पुरुष प्रताप ज्ञानीके पास । ताते मोर न लागे फाँसा ॥
इनते काल बसावै नाहीं । नाम प्रताप जीव घर जाहीं ॥
छंद-सतनामके परताप धर्मन हंस निज घरको चले ॥
जिमि देखि केहरि त्रास गज हो कँपिके धरनी रले ॥
पुरुष नाम प्रताप केहरि काल गज सो जानिहै ॥
नाम गहि इसलोक पहुँचे बहुरि भव नाहिं आनिहै ॥
सोरठा-सतगुरु शब्द समय, गुरु आज्ञा निरखत रहै ।
रहै नाम लौ लाय, कर्म भर्म ममता तजे ॥

चौपाई

त्रेतायुग तबही पग धारा । मृत्युलोक कीनो पैसारा ॥