कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1498, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १२२ )
बोधसागर
राजा इंद्रदौन पहाँ जैहैं । मेरो मंदिर सोई उठै हैं ॥
तब समुद्र ढाहनको धावै । मंदिर मेरो तोरि बहावै ॥
कृपा करो तब तुम तहाँ जाई । मेरो मन्दिर देहु थपाई ॥
जो हंसा तुमरो गुण गाई । ताके निकट तो हम नहिं जाई ॥
जो कछु वर माँग्यो धर्मराया । सो ज्ञानी दीनो करि दाया ॥
धर्मराय उठि शीस नवाई । तब ज्ञानी संसारहि आई ॥
इति
अथ सतयुगमें ज्ञानीजीको मृत्युलोकमें आगमनकथा और सत्य
सुकृत नाम धारण और जवत जीव तारण--चौपाई
ज्ञानी योगजीत कहलाये । सत्यसुकृत सुनींद्र बतलाये ॥
पुनि अचित मुक्तामणि होई । योग संतायन कहिये सोई ॥
अविनाशी करुणामय जानी । कबीर आदि बहुनाम बखानी ॥
चारों युगके चारों नामा । सतयुग सत्यसुकृत गुणधामा ॥
त्रेतामाँह सुनींद्र नामधर । करुणामय स्वामी कह द्वापर ॥
कलियुगमाँह कबीर कहाये । हिंदू मुसलमान गुण गाये ॥
सैद अहमद कबीर बखाना । शेख कबीर कहे मुसलमाना ॥
सोई सकल जक्त गुरु पीरा । नाम अनेकन ताके तीरा ॥
देश देशमें नाम है न्यारा । सारे जीव जक्तको तारा ॥
वेद पुराण जासु गुण गावै । नाम अनंत जासु निरतावै ॥
आदिकाल जब सतयुग आया । सत्यसुकृत सो नाम धराया ॥
तीन देवते कीन पुकारा । सो नहिं माने मन हंकारा ॥
प्रथमहिं जब पृथ्वीपर आये । नृप घोघल कह नाम हढ़ाये ॥
सतगुरु चीन्हि चरण लपटाना । नरनायक लह पद निर्वाना ॥
पुनि सतगुरु मथुरामें आई । खेमसरी तिय तहाँ रहाई ॥
खेमसरी ग्वालिनहि चितावा । कुल परिवार सहित मुक्तावा ॥