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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1500

( १२४ )

बोधसागर

जीव अनेकन पूछेहु जाई । यमसे को तोहि लेय छोड़ाई ॥
कहै कर्म वश जिव अज्ञाना । हमरे कर्ता पुरुष है ध्याना ॥
विष्णु सदा हमरे रखवारा । यमसे मोहि छोडावनहारा ॥
कोई महेश कि आसा लावै । कोइ चंडी देवीको गावै ॥
कहा करो जिव भयो बिगाना । खसम छोड़िकर जार बिकाना ॥
भरम कोठरी सब जग डारा । धोखा दे यम जीवन मारा ॥

साखी सोई काल सोई है करता, भक्ति मुक्ति तिहि हाथ ।
हमरो कहा न आदरे, मन यम जिवके साथ ॥
परंपंची निरंजन, मन सोई ओंकार ।
फंदे तीनों लोक सब, कोई न पावै पार ॥

चौपाई

सत्यपुरुषको आयसु पावो । कालहि मेटिछोरि जिव ल्यावो ॥
जोर करो तो वचन नशाई । सहज जीवन लेहु चेताई ॥
जो ग्रासै जिव सेवै ताही । अनचीन्है यमके मुख जाही ॥
चहुँदिशि फिर आयौ गढलंका । जहँवाँ रावण बसै निशंका ॥
भाट विचित्र पन्यौ गुरुचरना । पायौ अमर धाम गहि शरना ॥
मंदोदरी प्रेममें पागी । सतगुरुके सो चरनन लागी ॥
रानीको दीनो गुरुदिच्छा । पूरन भई तासुकी इच्छा ॥
पुनि आयौ रावण दरबारा । जहाँ पौरिया रह रखवारा ॥
कह्यौ पौरियाते तब जाई । रावणको मम पांह बोलाई ॥
जबहि पौरिया खबरि जनाई । सिद्ध एक प्रभु तुमहिं बोलाई ॥
सुनि प्रभु क्रोधकीन तेहि बारा । तैं मतिहीन आहि प्रतिहारा ॥
शिवसुत मोर दरश नहि पावै । भिक्षुक मोकहँ कहा बोलावै ॥
यह मत ज्ञान हन्यौकिन तोरा । जो तू मोहि बोलावन दोरा ॥