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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1497

स्वसमवेदबोध

( १२१ )

कहा तुमार जीव नहीं माने । हमरी दिशभै वाद बखानै ॥
मैं हठ फंदा रच्यौ बनाई । जामें जीव परा अरुझाई ॥
वेद शास्त्र सुमिरन गुन नाना । पुत्र हैं तीन देव परधाना ॥
देवल देव पखान पुजार्ह । तीरथ व्रत जप तप मन लाई ॥
यज्ञ होम अरु नियम अचारा । और अनेक फंद हम डारा ॥
जौ ज्ञानी जैहो संसारा । जीव न माने कहा तुमारा ॥

ज्ञानी वचन-चौपाई

ज्ञानी कहै सुनो धर्मराई । काटो फंद जीव ले जाई ॥
जेतो फंद रची तुम बारी । सत्यशब्द ले सकल विडारी ॥
जिहि जिवको हम शब्द हटै हैं । फंद तुम्हार सबै सुतैहैं ॥

निरंजन वचन चौपाई

सतयुग त्रेता द्वापर माहीं । तीनों युग जिव थोरे रहिजाही ॥
चौथा युग जब कलऊ आई । तब तुव शरण जीव बहु जाई ॥
ऐसे वचन हारि मोहि दीजै । तब संसार गौन तुम कीजै ॥

ज्ञानी वचन चौपाई

अरे काल परंपंच पसारा । तीनो युग जीवन दुख डारा ॥
बिनती तोरि लीन मैं मानी । मोकहैं ठगे काल अभिमानी ॥
चौथा युग जब कलऊ आई । तब हम अपनो अंश पठाई ॥
काल फन्द छूटे नर लोई । सकल सृष्टि परवानिक होई ॥
घर घर देखो बोध विचारा । सत्य नाम सब ठोर उचारा ॥
पांच हजार पांचसौ पांचा । तब यह वचन होयगा सांचा ॥
कलियुग बीत जाय जब येता । सब जिव परम पुरुषपद चेता ॥

निरंजन वचन चौपाई

ज्ञानी बिनती सुनो हमारी । द्वापर अंत होय जिहि बारी ॥
बोध शरीर धरब हम जाई । जगन्नाथको नाम धराई ॥