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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1473

स्वसमवेदबोध

( १७ )

जब जननी अस बचन उचारा । सुनि संसै कर तिहूँ कुमारा ॥
माता कपट कीन हमपाहीं । पिताको भेद बतावत नाही ॥
तीनो बालक ताते रूठै । जननी बचन कहैं सब झूठै ॥
तब माता बोली रिसिआई । पिताको दरश करहु तुम जाई ॥
माता कह तुम पुष्प चढ़ाओ । पिताको शीस परसिके आवो ॥
चले जो पुत्र पिताकी आसा । पिता रहै पुत्रनके पास ॥
खोजत खोजत कतहुँ न पाई । रहे निरंजन सुन्न समाई ॥
लगी समाधि निरंजन तारी । निकसे वेद श्वास सँग चारी ॥
ऋग अरु यजुर अथरबन सामा । धरि तन रटहि निरंजननामा ॥
निरंकारकी अस्तुति करही । देव निरंजन गुन उच्चरही ॥
देव निरंजन दृष्टि न आवै । ज्योतिज्योति कहि श्रुतिगुणगावै
तिहिमें वेद निरखै निज नैना । अनुमानहिते भाखे वैना ॥
वेदन प्रति नभ बचन सुनाई । बासा करहु सिंधुमें जाई ॥
आज्ञा दियौ निरंजन राई । बसो वेद सागरमें आई ॥
बहुरि निरंजन सैन लखाई । आद्यासे अस कहौ बुझाई ॥
निज पुत्रनको आज्ञा दीजै । सिंधु मथनको उद्यम कीजै ॥
तब आद्या अस युक्ति बनाई । तीन सुता निज अंग उपाई ॥
पुत्रिन कह अस आज्ञा दीनों । बसहु जाय सागरमें तीनों ॥
माताको अस आयसु पाई । तीनों सिंधुमें गई समाई ॥
यह चरित्र जननी जो ठाना । ब्रह्मा विष्णु शंभु नहि जाना ॥
राखा गुप्त न मर्म बताया । आद्या सुतनसे बचन सुनाया ॥
सागर मथन जाहु मम वारा । पैहो वस्तु महा सुखसारा ॥
माताकी जब आज्ञा पाई । चले तिहूँ तिहि शीस नवाई ॥
मथ्यौ जाय सागरको सोई । कन्या तीन प्रकट तब होई ॥
तीनो कन्या जबही पाये । हर्षसमेत मातु ढिग आये ॥

बो० सा०