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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1472

( १६ )

बोधसागर

कहै निरञ्जन कामिनि पाही । पुरुष ढिग अब हम नहीं जाई॥
पुरुष लोक इहाँ रचि लीजे । यकछत राज हमहि तुम कीजे॥
अब तौ पुरुष आस नहीं मोही । गहिके बाह राखि हो तोही ॥

छन्द-भग ना हतो तिहि नारिके नख फारि कीन निरञ्जना ।
यमसाट जिव जेहि बाट विचरे घाट उत्पतिको बना ॥
भग भोग प्रथम सँयोग सोई कैल आद्या सो ठना ।
भे प्रकट ब्रह्मा विष्णु शंकर त्रिगुन भव निधि रंजना॥

अथ त्रिदेवकी जन्मकथा वर्णन-चोपाई

काल कल्लुङ्ग जब गयौ सिराई । रूपरंग कन्या तन छाई ॥
जब भलि भांति रंग तन भीना । कन्या कैल व्याह सँग कीना ॥
कूर्मको तीन शीस जो रहेऊ । कैल काटिके भक्षण कियऊ ॥
ताते तीन अंश प्रकटाने । ब्रह्मा विष्णु महेश बखाने ॥
देव निरंजन आदि कुमारी । केते काल कीनो सुख भारी ॥
कैल अरु कामिनि भोग बिलासा । स्वसमवेद भलिभांति प्रकाशा ॥
तीनो सुत जिहि काल उपाई । धर्मराय तब गयौ लुपाई ॥
राजपाट आद्याको दीना । सुत्रमाहँ निज बासा कीना ॥
कह्यो निरंजन आद्या पासा । मेरो भेद न करहु प्रकाशा ॥
पुत्रनसे जनि बात जनावो । मेरो भेद न तिनहि सुनावो ॥
यतन अनेक ध्यान जौ लैहैं । तो मम दर्श पुत्र नहीं पैहैं ॥
यह कहि शून्यमें गयो समाई । योगसमाधि निरञ्जन लाई ॥
मातासे सुत पूछे बाता । पिता हमार कहाँ है माता ॥
पुत्रनते कह आदि भवानी । पिता तुमार हमहुँ नहीं जानी ॥
रचना सकल हमहिते होई । हम तुम तुम हम और न कोई ॥
तुमहो पुरुष हमहि तोर जोई । हम तुम दूसर और न कोई ॥
हम हैं पिता हम ही हैं माता । हम ही तीन लोकके दाता ॥