कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
तब माता पुत्रन कहि टेरा । यह तो काज भयौ सुत तेरा ॥
सावित्री ब्रह्माको दीना । विष्णु लक्ष्मीको बरि लीना ॥
पारवती शंकरको ब्याहा । नारि पाय अतिमनहि उछाहा ॥
काम विवशभे तीनों भाई । देव दनुज सब ही प्रकटाई ॥
जननी पुनि पुत्रन समुझावो । सागर मथन फेरि तुम जावो ॥
जो जिहि मिले लेहु तुम सोई । तीनों पुत्र चलत तब होई ॥
सोरठा-रश्म न लायौ बार, चले तिहुँ सुत सिंधुतट ।
मथ्यौ ताहि चित धार, निकसे चौदह रतन तब ॥
चौपाई
चौदह रत्न निकस जिहि बारी । लै जननीके सम्मुख धारी ॥
माताके जब आगे कीना । ताने बांटि तिहुँको दीना ॥
पायौ वेद सो ब्रह्मा लीनो । पढ़ि गुनिके विचार सो कीनो ॥
ब्रह्मा वेद पढ़न जब लागा । पढ़त वेद तब भौ अनुरागा ॥
कहै वेद पुरुष यक आही । निराकार जिहि रूप न छाही ॥
सत्य माई सो रूप देखावत । चितवत दृष्टि नजर नहि आवत ॥
स्वर्ग सीस पग आहि पताला । यह सब देखो ताको रुयाला ॥
ब्रह्मा विष्णुसे कह समुझाई । तुमहू शंख सुनो चितलाई ॥
आदि पुरुष यक वेद बतावा । वेद कहै हम भेद न पावा ॥
तब ब्रह्मा माता ढिग आये । करि प्रनाम तेहि शीस नवाये ॥
हे माता मोहि वेद बतावा । सिरजनहार और बतलावा ॥
दोहा-ब्रह्मासे माता कहे, सुन सुत मेरी बात ।
सप्त स्वर्ग है शीस जिहि, चरण पताल है तात ॥
जौ इच्छा तोहि दरशकी, पुष्प लेहु तुम हाथ ।
बेगि सिधारो ताहि ढिग, जाय नवावो माथ ॥
चौपाई
ब्रह्मा मातहि शीस नवाई । उत्तर दिशा बेगि चलि जाई ॥