कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्वसमवेदबोध
( १५ )
अथ आद्या और निरञ्जनकी कथा वर्णन-चौपाई
परम पुरुषकी आज्ञा पाई । कन्या तबहि कैल ढिग आई ॥
यकपग खड़ी सेवमें लागो । छुटी समाधि निरञ्जन जागो ॥
सम्मुख पलक उचारि निहारी । देखा ठाढ़ी आदि कुमारी ॥
परमरूप शोभा सरसाई । देखतके लहि काम सताई ॥
कहैं कैल सुनु आदि भवानी । मिलि हमतुम जगरचना ठानी ॥
तब आद्या अस उत्तर दीना । यह विचार तुम अनुचित कीना ॥
मैं हौं बहिन तू मेरो भाई । मोहि तोहि ना होय सगाई ॥
यहि करनी तोहि लागै पापा । धर्मराय तब निज पद थापा ॥
पुण्य पापके भय मोहि नाही । पुण्य पाप हमही ते आही ॥
पुण्य पापके हम करतारा । कोई लेय न लेख हमारा ॥
कहैं कैल सुन आदि कुमारी । मोहि कारन तोहि पुरुष सँवारी ॥
मानि लेहु तुम हमरा बचना । मिलि हमतुम करिये जगरचना ॥
कैल वचन आद्या नाहिं माना । उत्तर प्रति उत्तर तोहि ठाना ॥
तब मन रोष निरञ्जन कीना । निज मुखमाहि मेलि तिहि दीना ॥
लीलत कन्या कीन पुकारा । पुरुष पुरुष कहि वचन उचारा ॥
ततक्षण योग जीत प्रकटाने । गहे कमान बान कर ताने ॥
सुरति बानते कैलहि पारा । कन्या मुखते बाहर डारा ॥
जब कन्या मुख बाहर आई । योगजोत तब गयो लोपाई ॥
कन्या भयबश भै तिहि काला । पुरुषकि सुधि बिसरायौ बाला ॥
पिता पिता कहि कैलहि बोले । मदन प्रचंड तासु तन डोले ॥
कियो निरञ्जन सकल पसारा । पुण्य पाप दोउ रचे अपारा ॥
पुण्य पाप दोउ फंदा होई । जामें अरुझि रहे सब कोई ॥
योग यज्ञ संयम व्रत पूजा । सब हमही कोइ और न दूजा ॥
रची छुधा माया बिकरारा । पुरुष लोकको मूँढौ द्वारा ॥