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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1470

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बोधसागर

बहुरि पुरुष दीनो बरदाना । सोइ होई जो तोहि मनमाना ॥
बहुरि निरंजन विनय उचारा । बीज खेत दीजै करतारा ॥
देहु ठौर बैठा जहँ जाई । तबहि पुरुष अस बचन सुनाई ॥
मान सरोवर बैठक लीजै । तीन लोककी रचना कीजै ॥
तब करता मन कीन विचारा । बीज खेत तिहि काल सँवारा ॥

अथ बीजखेत अथवा आदि शक्तिकी

उत्पत्ति वर्णन-चौपाई

अद्याकी उत्पत्ति बखानों । ग्रंथ श्वास गुंजार प्रमानों ॥
निजतन मधि प्रभु मैल निकारी । रची ताहि आदि कुमारी ॥
पुरुष मैलते साँचा कीना । पैठी मैल रंग तिहि दीना ॥
देकर रंग बरन सब फेरा । भीतर मल मोह मद चेरा ॥
पुरुष मैलते पुत्री कीनी । पाँच तत्त्व तिहि भीतर दीनी ॥
उत्पत्ति पारस पुत्री पावा । प्रगटी कला अनंत सुभावा ॥
नख शिष देह सिद्ध प्रभु कीना । पंचह श्वास तिहि भीतर दीना ॥
जब श्वासा कायामें गैऊ । प्रगटी ज्योति जगामग भैऊ ॥
आठो अंग बना बहु रंगा । पारससार ताहिके संगा ॥
निर्मल उदित बतीसो दंता । चमकै बिजुली कला अनंता ॥
उपजी ज्योति अखंडित बानी । बोले बचन पुहुष रससानी ॥
मधुर वचन अरु लीला धारी । देख रूप जब पुरुष दुलारी ॥
उपजी रंग रूपकी खानी । बोले अमी विरहकी बानी ॥
उपजी कन्या कला अनूपा । पुरुषते प्रकट पुरुष स्वरूपा ॥
जिहिया रस सब उत्पत्ति कीना । सोंपा रस कन्याको दीना ॥
उपजी कन्या अगम सुभावा । अष्टंगी कह पुरुष बुलावा ॥
पुत्री जाहु निरञ्जन पाही । तुमकहँ समरथ सदा सहाई ॥