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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1469

स्वसमवेदबोध

( ९३ )

चाले धर्म हर्ष हिय वाढ़े । मनमें करत गुनावन गाढ़े ॥
जाय कूर्मके सम्मुख भयञ्ज । नहीं प्रनाम दंडवत कियञ्ज ॥
देखे धर्म कूर्मकी काया । अठानवे कोटि योजन बतलाया
बारह पालंग कूर्म शरीरा । षट पालंग धर्म बलवीरा ॥
धर्मराय तब कूर्मते कहई । मोहि पुरुषकी आज्ञा अहई ॥
सृष्टिकी रचना मोकहँ देहो । ना देहो तो मारिके लेहो ॥
तबहि कूर्म निज मनहि विचारी । यह तो काल भयो हंकारी ।
कहैं कूर्म सुनिये धर्मराया । पुरुष मोहि नहिं कछु फरमाया ॥
हमते मांगे कछु नहिं पावो । जाय पुरुष ढिग वेगि सिधावो ॥
यह सुनि धर्मराय अतिकोपा । कूर्मते युद्ध करण प्रण रोपा ॥
तपबल काल भयो बरियारा । अहंकार करि कूर्म प्रचारा ॥
भिरा जायके सन्मुख धाई । करे यतन किमि रचना पाई ॥
धायकाल अतिबल तिहि डाटा । तासु तीन शिर नखते काटा ॥
शीस तासु जिहि औसर खंडा । उद्भते निकसा पौन प्रचंडा ॥
रणश्रव कूर्म तन उठा पसीना । सो जलतत्त्व पृथ्वीतिहिकीना ॥
पाँचतत्त्व धरती असमाना । सूरज चंद्र नखते प्रकटाना ॥
तनत पौन छूटा जिहि बारा । रचना सकल कीन विस्तारा ॥
जबहि प्रसेव बुन्द जल दीना । महिउनचास कोटि तिहि कीना ॥
दूधपै जैसे परे ढलाई । जलपर तथा जमीन जमाई ॥
कूर्मको तिहुँ सिर भक्षण कियञ्ज । बहुरि निरंजन शून्यमें गयञ्ज ॥
धर्मराय तब कीन विचारा । कहँ लगि तीनों लोक पसारा ॥
स्वर्ग मृत्यु कीनो पाताला । बिना बीज किमि कीजै बाला ॥
करि सेवा मांगो वर सोई । जाते तिहुँ पुर मेरो होई ॥
पूर्वध्यान तब कीन निरंजन । युग चौसठ कर सेवासंजम ॥
एकपाँव पुनि सेवा कियञ्ज । चौसठ युगलों ठाढे रहेञ्ज ॥