कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजनधर्मबोध
( ६५ )
दवै न हेठ भारसो पाईं । रोमखण्ड पूरण कठिनाई ॥
ऊपर हेठ रोम तहाँ भाली । रश्मिहु कतहूँ रहै न खाली ॥
अस पूरण चौकोर जो होई । सागर नाम बखानो सोई ॥
जितने खण्ड रोम गनि लीजै । तितने वर्ष प्रमान करीजै ॥
ऐसे कठिन पूर्ण लखि जाको । सागर एक नाम है ताको ॥
कोड कोड पर ताको गुनिये । कोडा कोडी सागर सुनिये ॥
तीस कोड अरु तीसै कोडो । सोलह सुन्न ताहिमें जोड़ो ॥
कोडा कोडी तीस कहीजै । यों सागरको लेखा लीजै ॥
कोडा कोडी सागर बनते । मानुष आयू ताते गनते ॥
एते कोडा कोडी जीये । ता पीछे तन त्याग सो कीये ॥
ऐसहि कूप समुद्र कहानी । जिमि सागरको लेखा जानी ॥
विविधि भांतिसे कीना लेखो । जैन धर्म सो निर्णय देखो ॥
लघु दीर्घ आयू बहुतेरी । यथाकाल बल तैसो हेरी ॥
जबलौं आगे कर्म न टूटै । तबलौं जीव योनिमें जूटै ॥
अष्टकर्म रिपु जो संहारे । तासु नाम अरिहंत पुकारे ॥
जब ये कर्म जीवते टलके । तिमिर विहाय रूप तब झलके ॥
इति
अथ बारह भावनी अथवा आत्मगुण वर्णन
दोहा—प्रथम अथिर अशरण जगत, एआन असुचान ।
आश्रय संबर निरजुरा, लोकबोध दुलभान ॥
चौपाई
जक्तवस्तु कछु थिर नहिं परसै । देहरूप आदिक जो सरसै ॥
थिर बिन प्रीति कौनते कीजै । अथिर जानि ममता तजिदीजै ॥
अशरण तोहि शरण कोइ नाही । देखो तीन लोकके माहीं ॥
बो० सा० ९