कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
तीजा कर्मवेदिनी जानी । कोडा कोडी तीस बखानी ॥
यह उत्कृष्ट महाथित सोई । जघन मुहूरत द्वादश होई ॥
चौथे महामोहको मानी । थित उत्कृष्ट जैनपति बानी ॥
सागर सत्तर कोडा कोड़ी । लघु थित एक मुहूरत जोड़ी ॥
पंचम आयू कर्मशरीसा । उत्कृष्टी सागर तैंतीसा ॥
थित जाघन्न मुहूरत एका । जैन ज्येष्ठ कह सहित विवेका ॥
छठये नामकर्म निरुवारी । कोडाकोड़ी बीस विचारी ॥
यह दीरघ आयू थितधारी । जघन मुहूरत कहिये चारी ॥
गोत्र कर्म सातमा कहाये । उत्कृष्टी थित बीश बताये ॥
कोड़ाकोड़ी काल प्रमाना । लघु थित एक मुहूर्त बखाना ॥
अष्टम अंतराय जो उजागर । कोडाकोडी तीस है सागर ॥
लघु थित एक मुहूरत धर्मा । आयू विविधि भांतिसे बर्ना ॥
दीरघ मध्यम लघु कहि भाषा । काल प्रमान भांतिबहुराखा ॥
इति
अथ सागरप्रमाणवर्णन—चौपाई
सागरको अब करों बखाना । जैनधर्मको सुनो प्रमाना ॥
योजन दोय केर चौकोरा । सागर नाम ताहिको शोरा ॥
दोय सहस्र कोश जिहि माहीं । योजन पक्वा कहिये ताही ॥
सोई योजन सुनो प्रमाना । ताका यह चौकोर बखाना ॥
भेडरोमके तहाँ लेआई । ताका यह चौकोर बनाई ॥
रोमखंड अस करे जो कोई । खंड एक पुनि खंडन होई ॥
रोमभाग सब यकठे करिये । सो सब तिहि सागरमें भरिये ॥
रोमखंड जब पूरन कीजै । सागर ऐसो कठिन भरीजै ॥
दाबि दाबिके ऐसे भरना । परमकठिन सो सागर करना ॥
चक्रवर्त सेना समुदाई । तिहि सागरपरसे लंघि जाई ॥