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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1442

( ६६ )

बोधसागर

तेरो कोइ न राखनहारा । कर्मके वश चेतन निरधारा ॥
यहि संसार भावनी येहा । पर दर्बनसे कीजै नेहा ॥
तू चेतन ये जड सरबंगा । ताते तजो पराया संगा ॥
जीव अकेला आपतकाला । अर्ध मध्य भौन पाताला ॥
दूजा कोइ न तेरे साथा । सदा अकेला फिरै अनाथा ॥
भिन्य सद पुदगलसे रहई । भर्मभाव करि जडता गहई ॥
ये पुदगल रूपीके खंथा । चिदानंद तू सदा अबंधा ॥
अशुचि देखि देहादिक अङ्गा । कौन कुवस्तु लागि तेहि संगा ॥
हाड मांस रुधिरो गदगेहा । निरखि सूत्र मल तजो सनेहा ॥
असै परसे कीजै प्रीती । ताते बन्ध बढै विपरीती ॥
पुदगल तोहि अपन कोइ नाही । तू चेतन ये जड सबआहीं ॥
संवरपर रोकनको भाऊ । सुख होनेको यही उपाऊ ॥
चिदानंद हो निर्मल आपू । मिटै सहज परसंग मिलापू ॥
गहि लीजिये आपनो कर्मा । जाते प्रकट होय निज धर्मा ॥
थिति पूरी हो खिरखिर जाई । निरज्वर भाव बढै अधिकार्ई ॥
लोकमाहैं तेरो कछु नाही । लोक आन तू आन लखाहीं ॥
है यह षट्दर्बनको धामा । चिदानंद तू आतम रामा ॥
धर्म सुभाव आपनो जानो । आप सुभाव धर्म सो मानो ॥
जब तोहि धर्म प्रकट है आवै । तब परमात्म पदै लखि पावै ॥
दुर्लभ पर दर्बनको भाऊ । आपा नहिं दुर्लभ सुन राऊ ॥
जाँ तेरो है ज्ञान अनूपा । तौ नहिं दुर्लभ शुद्ध स्वरूपा ॥

इति

अथ जनयतिके अट्टाईस मूलगुण वर्णन

सोरठा-पञ्च महाव्रत सञ्च, सुमति पञ्च परकार है ।
इंद्रियाणि दम पञ्च, षट् अचार पृथ्वी शयन ॥