कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआत्मबोध
( १३ )
कहैं कबीर गुरु पीरसूं सुखसुख, परम सुख धाम तहाँ प्राण मेलै॥
छकासो थका फिर देह धारे नहीं, करम कपाट सब दूर कीया ।
जिनश्वासउश्वासका प्रेमप्यालापिया, नामदरि आवतहाँ पैसिजीया ॥
चढीमतबालिया औरहु आमनसावता, फटिकज्यों फेरिनहिं फूटजावै।
कहैं कबीर जिनवासनिर्भय किया, बहुरि संसारमें नाहिं आवै ॥
तरक संसार सो फरक फुक्र सदा, गरक गुरुज्ञानमें युक्ति योगी ।
अरध अरु उरधके बीच आसन किया, बंक प्यालेपीवे रस भोगी ॥
आधा दरिआव जहाँ जाय डोरिलगी, महल वारीकका भेदपाया।
कहैं कबीर यों संत निर्भय हुआ, परमसुख धाम तहाँ प्राणलाया ॥
चमड़ी मतबालि तहाँ ब्रह्म भाठी झरै, पिपै कोह सूरमां शीसमेलै।
पांचको मेलि सैतानको पकड़ि करि, प्रेमकाप्यालाअधर झेलै ॥
पलटिमनपवनको उलटिसूधाकंवल, अरधअरुउरधबिचध्यानलावै।
कहैं कबीर मस्तानमाता रहै, बिनाकर तातियां नाद गावै ॥
आठही पहर मतबाली लागी रहै, आठही पहरकी छाक पीवै ।
आठही पहर मस्ता माता रहै, ब्रह्मकी छोलिमें संत जीवै ॥
साचही कहतअरुसांचही रहत है, काचको त्यागिकरि सांच लाग।
कहैं कबीर यों सन्तनिर्भय हुआ, जन्मअरुमरनका भर्म भागा ॥
करत किलोक दरिआवके बीचमें, ब्रह्मकी छोलिमें हंस झूलै ।
अरध अरु उरधका एकवारा तहाँ, पलटिमनपवनको कमलफूलै ॥
गगन गजें तहाँ सदा पावस झरै, होत झड़रैन दिन बजै तूरा ।
बेनकितेवको गमनाहीं तहाँ, कहैं कबीर कोई रमै सूर। ॥
बजत करताल तहाँ नीरनिर्झरझरै, होत टकसाल तहाँ, शब्दपूरा ।
गैबकी मौन अरु ज्ञानका चांदना, शब्दअनहद तहाँ बजै तूरा ॥
होत ततकार तहाँ निरतनिशदिन करै, सुरतिमनपवनके बैठिछाजै ।
कहैं कबीर गुरुपीरकी मिहरिसूं, बिना बयबादले गगनि गाजै ॥