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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1390

( १४ )

बोधसागर

गगनकीगुफातहाँ गैवाकाचांदना, उदयअरुअस्तका नाम नाही ।
दिवसअरुनैतहाँ नेकनहिं पाइये, परमप्रकाशका सन्तमाहीं ॥
सदा आनन्द दुख द्वन्द व्यापे नहीं, पूर्णानन्द भरपूर देखा ।
भ्रम अरु भ्रान्ति तहाँ नेकनहिं पाइये, कहैं कबीर रस एकपेखा ॥
खेल ब्रह्मांडका पिण्डमें देखिया, जगतकी भरमनादूर भागी ।
बाहिरा भीतराएक आकाशवत, सुषुप्ता डोरी तहाँ उलटिलागी ॥
पाँचको पलटिकरि शून्य मोघरकिया, धरामें अघर भरपूरदेखा ।
कहैं कबीर गुरु पीरकी हमरि सँ, त्रिकुटि मध्य दीदार पेखा ॥
देख दीदार मस्तान मन होरहा, सकल भरपूर है नूर तेरा ।
सुभग दरिआवजहाँहंसमोतीचुगे, कालका जालतहाँ नाहिनेरा ॥
ज्ञानकीपालिअरुसहजमतवालिहै, अघरआसनकिया अगमडेरा ।
कहैं कबीर तहाँ द्वैत भासे नहीं, जन्म अरु मरनका मिटाफेरा ॥
ब्रह्मदरियावतहाँ करतकिलोलमन, सुरतिकीसीपतहाँ शब्दमोती ।
गुरुपीरकीनिहरते भेदयह पाय है, मोतिया माँहितहाँ नाम जोती ॥
तिनयापरख कोइ जानिहैं जौहरी, कौडियावणिजनहिंपरखिआवे ।
कहैंकबीरकोइ होय मरजीबता, तोखेल दरिआवका हाथ आवै ॥
चितकीरचमककीप्रीतिकरि पथरिया, सुरतिकासोखताखूबलाया ।
अग्निको झारि अवधूतप्रचण्ड करि, कर्मसब काठले माँहि द्याया ॥
हुआ निर्धूमसब सकलसंसार मिटा, खुला कपाट तब घाटपाया ।
कहैं कबीरअब द्वैत दीखै नहीं, अखंड करूणा भई रामराया ॥
करियोगयमडाठउगालि करिदेहगुण, चतुर्दशभवनका लोग खाया ।
महाप्रलयकियाबीजकोईनारहा, रहाएकनिर्द्वन्दनहिंकालखाया ॥
खेल अगाधकोइ साधुभल पाइ हैं, महाप्रलय जिनकिया सोई ।
कहैं कबीर फिर उपजिविनशै नहीं, अहंमताजिनकुबुधि खोई ॥
कालकेजालके भेद नहिं राममें, कालकहाँ कौनको खाइ हैं रे ।