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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1388

( १२ )

बोधसागर

अधर दरिआव धसेको मीलिया, बाहिरा भीतरा एक पानी ।
कहैं कबीर यह खेलदरिआवका, योग अवधूतकी यहै बाणी ॥
शशि प्रकाशते सूर उगासही, तूर बाजै तहाँ संत झूले ।
तत झनकार तहाँ नूर वर्षत रहै, सरस पीवै तहाँ पांच भूले ॥
दरिआव और बुन्दज्यो देखअन्त नहीं, जीव अरुशीवयो एकआही ।
कहैं कबीर यह सैन गुंगा तणी, वेद कितेबकी गम नाही ॥
अगम स्थान गुरुज्ञान बिन नाल है, लहै गुरुज्ञान कोइ संत पूरा ।
द्वादशां पलटि करि षोडशां प्रकटै, गगन गजै तहाँ बजै तूरा ॥
ईड़ा पिंगला सुषुमना समकरै, अर्ध अरु उर्ध विचध्यानलावै ।
कहैं कबीर सोइ संत निर्भय रहै, कालकी चोट फिरनाहि खावै ॥
अधर आसन किया अगमप्यालापिया, योगको मूलगहि युक्तिपाई ।
पंथ बिन चलिगये शहर बेगम्य पुरा, दया गुरुदेवकी समझि आई ॥
ध्यान धरि देखियानैन बिनुपेखिया, अगम अगाध सब कहत जाई ।
कहैं कबीर कोइ भेद विरला लहै, सो कहैया भेद भाई ॥
शहर बेगम्य पुरागम्य कोई ना लहै, होय बेगम्य सोई गम्य पावै ।
गुननकी गम्य ना अजब बिश्राम है, सैनको लहै सोइ सैनगावै ॥
मूक बाणी तिको स्वाद कैसे लहे, स्वाद दावै सोई सुख मानै ।
कहैं कबीर या सैन गुंगा तणी, गुंगा होय सो सैन जानै ॥
अधरही ख्याल अरु अधरही कल है, अधरके बीच तहाँ मठकीया ।
खेल उलटा चला जाय चौथे मिला, सिन्धुके मुख फिर शीस दीया ।
शब्द घंघोर टंकोर तहाँ अधर है, नूरको परास करि पीव पाया ।
कहैं कबीर यह खेल अवधूतका, खेलि अवधूत घर सहज आया ॥
छका अवधूत मस्ताना माता फिरै, ज्ञान वैराग्य सों छका पूरा ।
श्वास उश्वासका प्रेम प्याला पिया, गगन गजै तहाँ बजै तूरा ॥
पीठ संसार सो राम राता रहैं, यतन जरना लिया सदा खेले ।