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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1326

( १८६ )

बोधसागर

मेघनाद गजनीं तहां कहिये । शंख शब्द धुन तामों लहिये ॥
बाजा सुने सूष्य तव होई । काम क्रोध मद सब गहि खोई ॥
लोभ मोह तज पावे सोई । प्रवर्त छोड़ निरवर्त जो होई
तमो सतो रजो गुण विसरावै । आगे रूप दर्श तब पावै ॥
अगोचरीको अब कहेउ उपाई । योगी कर्म महा सच पाई ॥
पांचे मुद्रा उनमुनि जानी । ताकर भेद अब कहीं बखानी ॥
उनमुनि देश लखे जब जाई । अमर वस्तु तब भाषे आई ॥
ब्रह्म अखण्ड देखिये जाई । ब्रह्मरूप तब भाषे आई ॥
श्वेत पीत श्याम नहीं सोई । अरुण सजुजतें न्यारा होई ॥
रूप सरूप हृद वेहद नहीं । चारो बानि खानि नहीं ताहीं ॥
ब्रण अब्रण काया नहीं माया । युग बैदनकी तहाँ न छाया ॥
षटदर्शन पाखंड ना तहाँ । बावन अक्षर अकार न जहाँ ॥
नौ षट चार अष्टदश नहीं । पांचो तत्त्व धाम नहीं ताहीं ॥
मन बुध चित अहंकार नावासा । काल कर्मको नहीं प्रकाशा ॥
तहाँ ध्यानधर तारी लावै । सोई मूल परम पद पावै ॥
उनमुनि सिरवर बहुर चढ़जाई । जहाँकी गम्य देव नहीं पाई ॥
नहीं तहाँ काल नहीं तहँ काया । नहीं तहाँ प्रमत्ता मोहन माया ॥
चन्द्र सूर तारागण नहीं । दिवस रैन तहाँ धूप न छाहीं ॥
पिंड ब्रह्मांडको तहाँ न लेखा । केवल पारब्रह्म तहाँ देखा ॥
अलखरूप तहाँ अबिगत सोई । सबके परे ध्यान वह होई ॥
तासों ध्यान लगावे प्राणी । असी चारके छूटे खाणी ॥
अब वेदनको बास बताऊँ । ताको भेद अब वर्ण सुनाऊँ ॥
जिह्वा अग्र ऋग्वेदको वासा । नासा अग्र यजुर प्रकाशा ॥
श्रवण अग्र शाम सुति कहिये । चक्षु अग्र अथरवण लहिये ॥
शून्य अग्र सोहंग प्रकाशा । तहवों सुसमे वेद को बासा ॥