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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1325

पञ्चसुद्धा

( १८५ )

मुखके अग्र खेचरी बासा । ताको ध्यान जन करे अकाशा ॥
नासा अग्रत्रिकुटी अस्थाना । चाचरी सुद्धा तहाँ बखाना ॥
चक्षु अग्र भोचरी जाना । उर्ध्वअकाशको है तहाँ ध्याना ॥
श्रवन अग्र अगोचरी थाना । सहज शून्यको है तहाँ ध्याना ॥
तिलकपाट उनसुनी कहीजै । महाशून्य ध्यान तहाँ कीजै ॥
प्रथमहि खेचरीक सुद्धा कहिये । धूमवरण रंग तहाँ लहिये ॥
पीतवर्ण तहाँ देखे जाई । अकह रूप तहाँ रहो समाई ॥
औरौ वर्ण रक्त लख आई । कामधेनु तहाँ देखो गार्ई ॥
करुणवृक्षकी तहवों छाया । नहीं तहाँ काल नहीं तहाँ काया ॥
तहाँ समाध लगावे जाई । अमी बुंद तहाँ चाखे भाई ॥
ताकर पीवत अमर होइ जाई । सोई भेदमें वरण सुनाई ॥
द्वितिये चाचरि सुद्धा बखानी । नासा ध्यान तासको जानी ॥
तहाँ उत्तंग ब्रह्मको देखा । हंस रूप तहवों पुन पेखा ॥
मणिगण रतन विन्दको बासा । कर्तारूप पुरुष प्रकाशा ॥
जगमग ज्योति देखिये तहिया । बिन शशि सूर उजैरो जहिया ॥
चहुँदिश दामिनि दमके आई । चन्द्र सूर तामों छपजाई ॥
इतना रूप चाचरी जानी । ताको भेद कहीं प्रवानी ॥
त्रितिये भोचारी सुद्धा कहिये । अष्ट अंग पुन तामों लहिये ॥
मन बुध चित अहंकारन माया । ममता काम हर्षकी छाया ॥
तेज पुञ्ज तहाँ झिलमिल देखा । सूक्ष्म अस्थान तहाँ पुन पेखा ॥
चित चेतन्य तहाँ पुन दोई । तामों मिले परमपद सोई ॥
भोचरी सुद्धा कहि समझाई । ताको मर्म कोइ ज्ञानी पाई ॥
चौथे अगोचरी सुद्धा जाहीं । महाशब्द धुन उपजे ताहीं ॥
नाना ताल बैन मृदंगा । यंत्र ढोल सहनाई अंगा ॥
राबाब किंकिन झालरी बाजा । नभेरी चिंचिन शंखधुन गाजा ॥