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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1327

पञ्चमुद्रा

( १८७ )

वेदनके अस्थान बताई । अब इंद्रिनके स्वाद लखाई ॥
लिंग इंद्री कामिन सो नेही । जिह्वा षट् श्वाद तो लेही ॥
नासा गंध सुगंध अघाई । चक्षु इंद्री रूप लोभाई ॥
श्रवण स्वाद मधुर धुन बानी । ये पांचोंके स्वाद बखानी ॥
पृथी अस्थूल ऋग्वेदकी बानी । नीर अस्थूल जजुर पहिचानी ॥
वायु अस्थूल साम सुतिं कहिये । तेज अस्थूल अथरवण लहिये ॥
अनहद अस्थूल सोहंगकी बानी । सुसम देवताको पहिचानी ॥
खोजे ताहि मुक्त तब होई । सुसम वेद सम और न कोई ॥
वेद अस्थूल कहा समझाई । आसन योगी भेद बताई ॥
पृथ्वीरूप जहाँ आसन जाना । जीवरूप योगी पहिचाना ॥
पानीरूप जहाँ आसन कहिये । हंसरूप योगी तहाँ लहिये ॥
तेजरूप जहाँ आसन जानी । चेतनरूप योगी पहिचानी ॥
बांयेरूप है आसन जहिया । निराकार योगी है तहिया ॥
आकाश रूप आसन प्रवाना । निरंजन योगी जहाँ बखाना ॥
आवागम अब भेद बताई । तुमसो सुकृत नाहिं डुराई ॥
जीव पृथी मिल आवे जाई । मिल पृथी पुनि बहुरि सिधाई ॥
हंस रूप जल मिलके आवै । बहुर नीर मिल घरहि सिधावै ॥
चैतन तेज मिल आवै सोई । बहुर तेज मिल तहाँ सगोई ॥
निरालंब बाये मिलि आवै । बहुर बाये मिल गृहे समावै ॥
निरञ्जन मिल आकाशको आवै । बहुर गगन मिल उलट समावै ॥
आवागम मैं दीन बताई । जन पहुँचनको भेद लखाई ॥
प्रथम पृथीको जल उपजावै । सो जल बहुर पृथीको खादे ॥
जलकी उत्पत्त तेज सो होई । भक्षे तेज पुन जलको सोई ॥
तेजको बाये रूप उपजावै । उलट वाये पुन ताको खावै ॥
बाँये रूप अकाश उपजाई । फिर अकाश पुन ताको खाई ॥
आकाश शून्यते उत्पत्त जानौ । बहुरि शून्यमें जाय समानौ ॥