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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1324

( १८४ )

बोधसागर

पञ्च लिंग औ पञ्च हैं पूजा । पञ्च एक पञ्च है दूजा ॥
पांचों आवें पांचों जाई । पांचों मरें पांचोंको खाई ॥
पांचों सुक्षिम औ पांच अस्थूला । पांच डार औ पांच हैं मूला ॥
पांच पाप औ पांच हैं पुत्रा । पांच बस्ती और पांच हैं सुत्रा ॥
पांच पांच पांचों सब भवा । पांच स्वामी और पांच हैं सेवा ॥
पंच गुरु और पंच हैं चेला । पांच भाव और पांच हैं मेला ॥
पञ्च मुद्राका कहों बिचारा । ताको योगी करे सम्हारा ॥
चार छोड़ पांचो करे बासा । ताते पांचका कहो प्रकाशा ॥
पांचों मुद्रा उनमुनि कहिये । तासों भेद सुत्तिको लहिये ॥
ब्रह्म प्रकाश तहाँ पूरन चन्दा । रैन दिवस नहि सहज अनन्दा ॥
दुतिया भाव तहाँ नहि काया । तहवां नहीं धूप और छाया ॥
हम तुम कर्म भ्रम नहि दोई । तहां सिलान ब्रह्म सो होई ॥
सहज शून्यको लखे जो भेवा । आप ही कर्ता आप ही देवा ॥
प्रथमही आपुपुर्ष विस्तारा । तहांते भयो ब्रह्म आकारा ॥
आकारते अहंकार उपजाई । ताते बहु विस्तार बनाई ॥
सोहं स्वासा पुर्ष उचारा । तहांते भौ अक्षर ओंकारा ॥
पांच ब्रह्मकी उत्पति भाषों । तुमसों गाय कछू नहीं राखों ॥
अकास ब्रह्मको भास बताऊँ । वायु ब्रह्मको तहवां लाऊँ ॥
पुन है तेज ब्रह्मकी बानी । जलकी बहुरि कहों उत्पानी ॥
फिर पृथ्वीको भास लखाऊँ । प्रथम ब्रह्मको भेद सुनाऊँ ॥
अविगत आदि ब्रह्मको भासा । ताको भेद कहों प्रकाशा ॥
प्रथमें नाम आकाश कहाई । दुतिये गगनाकाश बताई ॥
फिर रकाशको नाम सुनाऊँ । चौथे गगनसकाश लखाऊँ ॥
पांचे महद अकाशकी बानी । पञ्च अकाशमें कहों बखानी ॥
अब सुन कहों पञ्च अस्थाना । सकित तुमसों कहों बखाना ॥