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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1323

पञ्चमुद्रा

( १८३ )

अगोचरीको अब कहो निवासा । तासों कीजे योग प्रकाशा ॥
सुर्तनदी तहां उठे तरङ्गा । झालर भेरी शंख मृदंगा ॥
किकिन चिचिन किगरी बैना । गरजनशान धुनधुन सुवसेना ॥
शून्य महलमों बैठे जाई । दशोंद्वार तब वन्द कराई ॥
यह विध ध्यान गगनमों करई । सत्तर बाजा तब सुनु परई ॥
अनहद नाद सुने जो प्राणी । उपजे महासुखके खानी ॥
सतगुरु कहै सांच सोई योगी । तहां मरण मगन रमावत भोगी ॥
अगोचरी मुद्रा कहा प्रकाशा । ताको योग युक्तकी आशा ॥
उनमुनि मुद्रा महद अकाशा । अलखपुर्ष तहां कीन्हों वासा ॥
ब्रह्मप्रकाश तहांअण्ड न पिण्डा । लोकालोक नहीं ब्रह्मण्डा ॥
ब्रण अब्रण जात नहीं पाती । नहींतहां दिवस नहीं तहांराती ॥
तामों सरवर गहिर गँभीरा । जाके आदि अन्त नहीं तीरा ॥
ज्ञानी योगी जप तहां लागा । भयोअनन्द सकलो भ्रम भागा ॥
तामो लीन रहै जो कोई । गुप्त मनोरथ पावै सोई ॥
योग जीत कहो भेद अपारा । बिरला साधू करे विचारा ॥
खेचरी चाचरी भोचरी जानी । अगोचरा उनमुनिकही बखानी ॥
उनमुनि लागी योगपर निद्रा । सुख समाजजहांपरम अनन्दा ॥
यह प्रकाश उनमुनिमों कहिये । कछुक भेद पुनि तामों लहिये ॥
पञ्च मुद्रा और पञ्च अकाशा । पंच ध्यान और पञ्च प्रकाशा ॥
पञ्च वर्ण और पञ्च हैं वेदा । पञ्च तत्त्वके पञ्च हैं भेदा ॥
पञ्च मन्दिर औ पञ्च हैं द्वारा । पञ्च रूप औ पञ्च अहारा ॥
पञ्च इन्द्री औ पञ्च हैं स्वादा । पञ्च विद्या औ पञ्च हैं नादा ॥
पञ्च हैं आसन पञ्च हैं योगी । पञ्च मंदिर औ पञ्च हैं भोगी ॥
पञ्च सत्त औ पञ्च हैं सीउ । पञ्च कर्म औ पञ्च हैं जीउ ॥
पञ्च पृथ्वी औ पञ्च हैं नीरा । पञ्च तेज औ पञ्च समीरा ॥