कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1322, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १८२ )
बोधसागर
योगजीत वचन
योगजीत तब बोलैं बानी । सुकित सुनौ आदि सहिदानी ॥
जाके मर्म ना जाने कोई । तुमसों भाष कहां मैं सोई ॥
उतपतको सब भेद बताऊँ । अगम निगम सब तुम्हे लखाऊँ ॥
साखी-ज्ञान पंचसुद्रा कहों, मूलज्ञान को सार ।
ऋषि मुनि देवनको मता, ताते अगम अपार ॥
चौपाई
प्रथमहि सुद्रा खेचरी कहिये । सो स्थान गगनमो लहिये ॥
धूप बरण तहां लखो प्रकाशा । चेतन ब्रह्मको तामैं वाशा ॥
तत्त्वमाहे विचित्र है सोई । कामधेनु तहां कहिये जोई ॥
पुढुप प्रकाश तहां बिजुली देखा । झिलमिल जोत तारागण देखा ॥
रक्तवर्ण तहां सूर्य लखाई । प्रथम आकाशको भेद बताई ॥
साचरीसुद्रा नासिका अस्थाना । उतंग बिंदको है तहां ध्याना ॥
तहां नाकाश गगन है वासा । बिजुली रूपरेख प्रकाशा ॥
मणिगण रतन मुक्तामणि हीरा । सोहंग रूप पवन तहां धीरा ॥
नासा अग्र करै तहाँ मेला । पवन सिन्धुमें दीजे हेला ॥
तासों हंस लीन होय जाई । निःअक्षरसो जाय समाई ॥
चाचरी सुद्रा दियो बताई । ताको भेद कहौ समुझाई ॥
भोचरीको स्थान लखाऊँ । रकाश गगनको भेद बताऊँ ॥
मन बुद्ध चित तहाँ होत हुलासा । तहां योग कीजे प्रकाशा ॥
चित्चेतन तहाँ झिलमिल देखा । नील वरण पवनकी रेखा ॥
तहवां कोट सूर्यको तेजू । झीन महलमों सुखमन सेजू ॥
तहां गगनमो होत अनन्दा । तहां उदित है पूरण चन्दा ॥
तामो अलख ब्रह्मको कहिये । जासों भेद मुक्तको लहिये ॥
तेहिसों ध्यान लगावै कोई । अमी बुन्द तहां चाखै सोई ॥