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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1317

कायापांजी

( १७७ )

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास चरनन चितलावा । अगमागम तुम मोहि बुलावा ॥
आगे गम्य मोहि देहु लखाई । अब मैं गहों सुरति बनाई ॥
यह तो ठीक चिन्हैउ मैं भाई । तुम परताप गम्य हम पाई ॥
अब आगेकर कहो बखाना । जहाँ मूलशब्दका पावों ध्याना ॥
जेहिते शब्दमें जाय समाई । तवन गम्य मोहि देहु लखाई ॥
भाषो मूल जाओ बलिहारी । मूलशब्द पुनि गहों सम्हारी ॥
सुरति कमल गम तुम भाखो । सुरति सम्हार अपने चितराखो ॥
सुरति कमल सुनब मैं साहेब । विहंगम डोरि गही चितलायब ॥
अब आगेका भाषो राहा । हम अजान का जानो थाहा ॥
तुम्हरे जनाय हम जानब भाई । तुम जानो सो करो बनाई ॥

साखी-समरत्थ आगे भाषो, मैकहू सुरति सम्हार ।
सकल पसारा मेटिके, उत्तह भवजल पार ॥
सतगुरु तब दया भई, पावों पद निर्वान ।
आगे गम्य बतावहु, सतगुरु वचन परमान ॥

सद्गुरु वचन-चौपाई

सुरति कमलके आगे भाखों । तुमसे गोप कछू नहीं राखों ॥
सुरति कमलहोय निकसो भाई । विहंगम डोरि गहो चितलाई ॥
विहंगम डोर दहिने दिशि जाई । तुमसों भेद कहौ समझाई ॥
सुरति कमलके कहों ठिकाना । आगे है योजन परमाना ॥
अक्षय वृक्ष तहाँ लागा भाई । दवना मरुआ बरनि न जाई ॥
बेलि चमेली बास सुबासा । बास सुबास किया प्रकाशा ॥

साखी-दवना मरुआ गुलाब है, गुलाब चमेली बास ।
तहवां अक्षय वृक्ष है, वरणों वास सुबास ॥