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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १७६ )

बोधसागर

सुरति डोरी चलै बरजहेरा । मथिके तत्त्व कपाट उघेरा ॥
तेहि आगे सुमेरु बखानी । बरनो द्वार स्वरूप खानी ॥
वाहि द्वार होय सुरति चढ़ाओ। आगे अगम भेद पुनि पाओ ॥
त्रिकुटी आगे सुमेरु ठेकाना । तापर जुब्बा अकाश विधाना ॥
आंगुलचारी अकाश परमानो । धर्मदास तुम निजकर जानो ॥

धर्मदास वचन

अब अकाशका भाखों राहा । हम अजानका जानों थाहा ॥

सद्गुरु वचन

अब अकाशका भाखूं लेखा । सुरतिकमल तहैं निजकर देखा ॥
बांये धर्मराय अस्थाना । दहिने सुरति द्वार ठिकाना ॥
सुरति कमल सुमेरुके आगे । बिहैगम डोर तहाँसे लागे ॥
सुरति कमलके रूप बखानो । एक चन्द्र आभा अनुमानो ॥
वाहि कमलमें झलकै चंदा । सुरति चढ़ाय तुम करो आनन्ददा ॥
तहवां डोर शब्दकी भाई । सुरति संयोग चढ़ि देखो जाई ॥
सुरति नाल है बड़ बरियारा । मध्य लिलाट धर्म रखवारा ॥
शब्द काहे न करहु विचारा । धर्मदास तुम अंश हमारा ॥
दहिने सुरति कमल कहैं पावा । तेहि आगे पुनि ध्यान लगावा ॥
तेहिदिगसुरतिकमलको लेखा । सुरति तत्त्व नैन बिन देखा ॥
ताकर भेद मैं देऊँ बताई । सुइ परमाण द्वार निरमाई ॥
धर्मदास मैं कहूँ पुकारी । तिल परमाण तहैं खुलै केवारी ॥
तेहि केवार दोय है घाटा । चढ़े सुरति तब पावो बाटा ॥
सोहैं सुरतिले चढो संभारी । तिल परमाण खुलै केवारी ॥
नासिकानाल सुरति जो ध्यावे । खोली केवारी तब बाहर आवे ॥
पशुरी सुरति कमलको जानी । तासे सुरति करो पहिचानी ॥

साखी-सतगुरु भेद बतावई, तब पावे यह द्वार ।
कहैं कबीर धर्मदाससो, निश्चय वचन हमार ॥