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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1318

( १७८ )

बोधसागर

चौपाई

अक्षय वृक्षके बरणों अंगा । श्वेत स्वरूप तहां देखो रंगा ॥
श्वेत स्वरूप तहां देखो भाई । ऐसा भेद अगम अर्थार्ई ॥
ऐसा अलख लखे जो कोई । जरा मरण रहित सो होई ॥
विहंगम डोरि तहाँते आई । अकल कलामें जाइ समाई ॥
श्रवण ऊपरका कहां ठिकाना । झींगुर शब्द करै घमसाना ॥
दहिने स्वरपर ताकर ठाऊं । यही निजभेद मैं तुम्हें बताऊं ॥
अर्ध कमल उर्धमुख रहई । तहवां मूल शब्द उच्चरई ॥
धर्मदास तुम करहु संभारा । अकल कलामें शब्द उचारा ॥
ताकी सुरति धर्मनि तुम धरहूँ । होय धर्मनि यहि शब्दे गहहूँ ॥
तौन शब्द मैं दीन बताई । उहै डोरीले आगे जाई ॥
सबै दिशि लागी है ताही । यहि डोरी गहि मिलहूँ वाही ॥
बिहंगम डोरी शब्दमें लागी । झींगुर शब्द ऊबे धन जागी ॥
अकल कमल है श्वेत स्वरूपा । ताहि जोतिका कहां निरूपा ॥
अकल कमलका भाषों लेखा । छत्तीस पंखुरी ताहि हम देखा ॥
झलके मोति वरणि नहि जाई । चहुँ दिशि ज्योति चमके आई ॥
छत्तीस पंखुरीका विस्तारा । आप आप मुख राग उचारा ॥
तेहि भीतरका कहां हवाला । आभा उठि तहां चमके लाला ॥
होय उजियार दीपकके टेमा । पावो जाय सुरतिके प्रेमा ॥
आभा उठे सो वरणि न जाई । तुमकहं दीन अलख लखाई ॥
भीतर कमल होय उजियारा । तहां मूलशब्द करै झनकारा ॥
उमगै मोती लाल अरु हीरा । तहवां बैठे सत् कबीरा ॥
मोती झालर ऊपर छाजे । भीतर शब्द जो मूल विराजे ॥
अक्षय कमल जहँ तार ठिकाना । गुह्यकमल जहाँ होय निदाना ॥
तेहि आभा वरणि न जाई । साठ भानुकी ज्योति छपाई ॥