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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1315

कायापांजी

( १७५ )

सदगुरु उवाच

दहिने घाट चन्द्रका वासा । बाँवें सूर करै प्रकाशा ॥
यही दोउ स्वर साधो भाई । चन्द्रद्वार होय निकसो आई ॥
अगम पंथ दहिने स्वर करहु । सुरती संयोगनाल चित धरहु ॥
चन्द्रद्वार होय आओ जाइ । शब्द सुरतिमें रहो समाई ॥
स्वर दाहिने सुरति चढ़ाओ । तबही डोर शब्दकी पायो ॥
शब्द डोर दहिने दिशि जाई । धर्मदास तुम गहो बनाई ॥
पाओ डोर शब्दको भाई । अगम पंथ चढ़ि बैठो जाई ॥
गहो बनाइ कटै यम पासी । पहुँचो लोक मिटै चौरासी ॥
स्वर दाहिने होय करे पयाना । तब सोहं सुरतिहोय अगु आना ॥

सार्वी--कहैं कबीर धर्मदाससे, ऐसा साधो घाट ।
आगे भेद बताऊं, तहं देखो लिजवाट ॥

चौपाई

अहो धर्मदास मैं भेद बताऊं । शब्दहि सुरतिका द्वार चिह्नाऊं ॥
भाष्यो शब्द सुरतिका पासा । सो मैं तुमसे कहों प्रकाशा ॥
कहूँ तत्त्व तहैं करो जो बासा । मथो तत्त्व तुम धर्मदासा ॥
मथो तत्त्व सुरति सो भाई । पुनि आगेको देहु रंगाई ॥
तत्त्व मथो तुम अंश हमारा । तत्त्वसे उतरो भवजल पारा ॥

धर्मदास उवाच

कह्यो तत्त्व तुम मथो बनाई । ज्ञानी तुमहि कहो समझाई ॥
कहवा आहि तत्त्व को बासा । सो ज्ञानी मोहि कहो प्रकाशा ॥

सतगुरु बचन

दहिनस्वर साधि चढ़ो आकाशा । त्रिकुटी मध्य तत्त्वका वासा ॥
त्रिकुटीमध्य तत्त्व जो रहाई । तहाँ सुरति सो देखो जाई ॥
त्रिकुटी मध्य तत्त्वको थाना तेहि मथि आगे देहु पयाना ॥