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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1210

( ७० )

बोधसागर

धर्मदास उवाच

धर्मदास भये बहुत अधीना । सद्गुरु पूरा तुम कहैं चीन्हा ॥
तुम्हरी दया नाम हम पावा । बन्दी छोड हंस मुक्तावा ॥
करहु दया अब अंतर्ध्यामी । लोक दीपको वरण बखानी ॥
जहवां सत्य पुरुष रह जोई । हंसा तहवाँ दर्शन होई ॥
पुरुष शोभा वरणि सुनावो । दया करो अब भेद लखावो ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर सुनौ धर्मदासा । ऐसा भेद नहीं परकाशा ॥
यह तौ भेद अगम है भाई । वेद कितेव कहूँ नहिं पाई ॥
शेष महेश न कोई जाने । ब्रह्मा खोजत ताहि भुलाने ॥
विष्णु सदा मन सुमरिन करई । पै काहू नहिं परकट करई ॥
ज्ञान कहै तब पुरुष बतावै । सुनि पुनि आपा लै ठहरावै ॥
यह जग मूरख महा अचेता । परम पुरुषते नाहिन हेता ॥
हेत बिहूना जो नर आही । यह तौ भेद कही नहिं ताही ॥
सुरतिवंत हंसा जो होई । तासे भेद न राखेहु गोई ॥
उपज्ञान यह भेद अपारा । तुमसे कहा आज हम सारा ॥
सूक्ष्म वेद भेद जो पावै । अजर अमर होइ लोकसिधायै ॥
लोक दीप औ प्रकट बखानौ । धर्मनिसुरति रनिति सो ठानौ ॥
तीनिलोकते भिन्न पसार । सत्य लोक पुरुष दरबारा ॥
पुष्प दीप जहँ पुरुष स्थाना । आदि पुरुष जहँ बैठ अमाना ॥
सूर्य सोरह जोति निवासा । ऐसा एक हँस परकाशा ॥
श्वेतै दीप श्वेत विस्तारा । श्वेतै मंदिर श्वेतै द्वारा ॥
अजर हंस है श्वेतै भाई । सदा अनंद रहै सुखछाई ॥
श्वेत छत्र सिंहासन छाजै । अनहद शब्द सदा धुनिगाजै ॥
अक्षय वृक्ष जहँ श्वेत सोहावन । श्वेत पुरुष श्वेत फल पावन ॥
श्वेतै पान श्वेत पनवेरा । श्वेत सुपारी नरिअर केरा ॥