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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1209

उग्रगीता

( ६९ )

ऐसी रहनी हंस रहावै । बहुरि न योनी संकट आवै ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास कहै सुनो गोसाई । पुरुष नाम कहऊ समुझाई ॥
सहस्रनाम जो देव बखाना । नेति २ कह बहुरि निदाना ॥
कौन नाम को सुमिरन करई । कैसे सदा पुरुष चित धरई ॥
कैसे आवागमन मिटाई । क्षर निर अक्षर कह समुझाई ॥

कबीर उवाच

सुनु धर्मनि तुम हंस पियारे । तुम्हरो काज सकल हम सारे ॥
सुमिरन आदि मैं तुम्है सुनावौँ । सकल कामना तोर मिटावौँ ॥
नाम एक जो पुरुषको आही । अगम अपार पार नहिं जाही ॥
वेद पुराण पार नहिं पावै । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर धावै ॥
जानि कहौँ तौ को पतिआई । अंत कहौँ तौ परलै जाई ॥
आंदे अंतमें बासा होई । निर अक्षर पावै जन सोई ॥
अक्षर कह सब जक्त बखानै । निरअक्षरको मर्म न जानै ॥
कहो न जाई लिखो ना जाई । बिन सद्गुरु कोउ नाहीं पाई ॥
सद्गुरु मिलै तो अगम लखावै । हंस अमी पीबत घर आवै ॥
अंकुरी जीव लहे निर्बाना । पावत हंस लोक पहिचाना ॥
सुतिवंत पावै निज वीरा । संग रहौँ मैं दास कबीरा ॥
जो कोई हंस प्रवाना लेई । अग्र नाम सद्गुरु कहि देई ॥
बिन सद्गुरु कोइ नाम न पावै । पूरा गुरु अकह समुझावै ॥
अकह नाम वह कहा न जाई । अकह कहि कहि गुरु समुझाई ॥
समुझत लोक परै पुनि चीन्हा । जाते लोक होइ लवलीना ॥
हरदम सुमिरे चित लगाई । लोक दीपमें जाइ समाई ॥
अजर अमर होइ लोक सिधावै । चौरासी बंधन मुक्तावै ॥
आवागमन ताहि नहिं भाई । जरा मरणका बीज नसाई ॥